ईमानदार होने में क्या रखा है .. ? दिलीप लोकरे का व्यंग्य

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आज के जमाने में बेईमान होना सबसे बड़ी ईमानदारी है। लो आप हँस रहे है …हँसिये मत। यह वक्तव्य पिछले दिनों बेईमानी पर ईमानदारी से की गई मेरे रिसर्च का नतीजा है। सच कह रहा हूँ। कसम से ! एक कहावत बड़ी मशहूर है कि ‘बेईमानी के धंधे में सबसे ज्यादा ईमानदारी है ‘। और मजे की बात यह कि अधिकाँश ईमानदार [ बचे ही कितने है?] भी इसे मानते हैं। आज की तारीख में ईमानदार होना भी किसी अजूबे से कम नहीं। हजारों की भीड़ में कोई कह दे कि मै ईमानदार हूँ तो सारे बेईमान उसके आस पास ऐसे इकठ्ठा हो जाते है जैसे किसी ‘बावरे गाँव में ऊँट’ आया हो। ठीक भी है। ईमानदार  होना कोई हंसी मजाक नहीं है कि कोई भी उठा और ईमानदार हो गया। इसीलिये बेईमानो के इस हुजूम में, ईमानदार को ढूँढना बड़ा आसान है। आवाज लगाओ “कौन है ईमानदार ?” तो किसी कोने कुचड़े से एकाद मरियल सा कोई सामने आ जाता है कहते हुए कि, ” मै हूँ “। भाई लाखों में एक होगा तो ढूँढना तो आसान होगा ही। कार्यपालिका,विधायिका, न्यायपालिका हो या कोई अन्य क्षेत्र, एकाद को खोजना बड़ा आसान है। मुश्किल होता है बेईमान को खोजना। और यह अभी नहीं बल्कि हमेशा से होता आया है। कोलम्बस की तरह ढूँढने क्या निकलो और मिल क्या जाता है। और हम समझते रहते है कि मंजिल पा ली।
ईमानदार  को ढूँढने के लिए किसी जाँच आयोग की जरुरत नहीं लगती। आयोग की जरुरत होती है बेईमानो के लिए। लेकिन पहली मुश्किल तो होती है आयोग के अध्यक्ष पद के लिए ईमानदार व्यक्ति खोजने में। फिर आठ दस साल तक आयोग की सुनवाई, बैठकें और जाने क्या क्या। और खुदा ना खास्ता रिपोर्ट बन भी गई तो ख़ारिज कर दी जाती है। बात ख़तम!
अच्छा जनाब ! वैसे भी ईमानदार  होने में क्या रखा है? जो कुछ नहीं करता या कर नहीं पाता, वह ईमानदार तो होगा ही। मुश्किल तो होती है बेईमान होने में। कितने खटकरम करने पड़ते है। ईमानदारी से कहूं तो सब कुछ है इस देश में, लेकिन बेईमानी से। वकील केस लड़ते है लेकिन मुजरिम को सजा दिलाने के लिए नहीं बल्कि उसे सजा से बचाने के लिए। पत्रकार जो छापता है उससे ज्यादा फायदा उसे उन जानकारियों से होता है जो वह नहीं छापता। पुलिस काम करती है लेकिन मुजरिम को पकड़ने का नहीं बल्कि इमानदारो के चालान बनाने का। आर.टी.ओ. है लेकिन लाइसेंस बनाने के लिए नहीं बल्कि एजेंट बनाने के लिए। लाइसेंस का क्या है वो तो एजेंट भी बना देगा। रेल टिकिट बुक करवाना हो , राशन कार्ड ,आधार कार्ड, पेन कार्ड, मकान का नक़्शा,जो कुछ भी करवाना हो यहाँ तक कि लड़की-लडके की शादी करवानी हो, बेईमानो के द्वारा सब कुछ बड़ी ईमानदारी से हो जाता है।
अब इतने बेईमानो की खदान मे कोई ईमानदार कैसे रह सकता है ? गुरुत्वाकर्षण जैसा ही बेईमानी का भी आकर्षण होता है। ईमानदार  भले ही ईमानदार को अपनी ओर नहीं खींचे, बेइमान जरूर दूसरे बेईमान को अपनी ओर खींचता है।
अच्छा चलिए, आप ही बताइए कि ईमानदारी का आखिर फायदा क्या है? बेइमानो को देखिये,ये …बड़े -बड़े फोटो छपते है अखबार में। पिछले कई सालों में अखबार में छपा किसी ईमानदार का फोटो याद आता है आप को ? ईमानदार मरदूद जेल में गया तो गया। कोई उसे नहीं पूछता। और बेईमान ? बेईमान अव्वल तो जेल जाता ही नहीं और कभी नौबत आ भी गई तो कई समाजसेवी, बड़े सितारे, यहाँ तक कि रिटायर्ड जज भी आ जाते है बचाने। वो कहते है ना …बेईमानी करते पकडे जाओ बेईमानी करके छूट जाओ [ थोड़ी सी परिवर्तित कहावत ] खैर! सारी बात का लब्बे-लुबाब ये, कि क्या रख्खा है ईमानदारी में। नेता, अफसर, समाजसेवी, सभी उसे ऐसे दूर धकेलते है जैसे ‘दूसरा गोला का पी के’ आ गया हो पास में। किसी सेक्युलर कांग्रेसी के लिए जैसे तथाकथित सांप्रदायिक भाजपाई व्यक्ति अथवा समाजवादी के लिए खुद का चाचा या सी.बी.आई. वाला अछूत होता है वैसे ही बेईमान के लिए ईमानदार। तो बताइये आप? छुआछूत बढ़ा रही है की नहीं, ये बेईमान ईमानदारी ? इसीलिए कहता हूँ ईमानदार होने में क्या रखा है
-दिलीप लोकरे  
E- सुदामा नगर , इंदौर -452009
Mobile – 9425082194

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