कांग्रेस के लिए किसान आंदोलन अब मुसीबत बना… गुस्ताखी माफ

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कांग्रेस के लिए किसान आंदोलन अब मुसीबत बना…तश्तरी में रखकर दिया गया किसान आंदोलन कांग्रेस के लिए लाटरी की तरह सिद्ध हुआ है, परंतु अब चूंकि चुनाव में अभी समय है इसलिए कांग्रेस के लिए भी यह बड़ी मुसीबत बन गया है कि इसे कब तक और कैसे जिंदा रखा जाए, क्योंकि मानसून की बारिश होते ही किसान अपने काम में लग जाएंगे, इधर नेता भी वापस अपने घरो में पहुंच जाएंगे, बड़ी मुश्किल से मरी कांग्रेस में थोड़ी सी सांस दिखाई दे रही थी इसे प्रारंभिक स्थिति में अरूण यादव ने बाद में सिंधियाजी ने सत्याग्रह कर जीवित रखा, परंतु अब कांग्रेस के स्थानीय नेता इस बात को लेकर परेशान है कि आगे कैसे इसे जीवित रखा जाए? बड़े नेताओं के आसपास घूमकर अपने नंबर बढ़ा रहे कांग्रेस किसान नेता और शहरी किसान नेता अब ठंडे पड़ गए हैं और वे अपने कामों में वापस लग जाएंगे! अब आंदोलन के ठंडा होने का ठिकरा जिला और शहर कांग्रेस पर फोडऩे की तैयारी भी शुरू हो गई है… इधर सज्जन वर्मा जो बड़े दिनों बाद सड़क के किसी आंदोलन में दिखे थे, वे भी फिर नदारद हो गए हैं, जो भी हो कांग्रेस के लिए यह अब आंदोलन मुसीबत का सबब बन गया है!

किसान आंदोलन से कई भाजपाइयों को आघात…
लंबे समय से अपने सिर पर तिलक लगवाने और पैर पुजवाने को तैयार बैठे भाजपा के नेताओं के लिए किसान आंदोलन श्राप बनकर आ गया… जैसे तैसे तो निगम मंडलों में दुकान सजने की स्थिति दिखाई देना शुरू हुई थी, वहीं किसान आंदोलन से बड़े नेताओं ने अपने हाथ खींच लिए, परिणाम यह हुआ कि अब यह बात दीपावली तक आगे बढ़ गई है… किसान आंदोलन से फुरसत नेतागण अब राष्ट्रपति चुनाव में लग गए हैं, इसके बाद अब फिर और भी कार्यक्रम आ जाएंगे, यानि जिनको भी बिना बत्ती की गाड़ी मिलेगी तो वह भी चार छ: महिने तक ही इस्तेमाल कर पाएंगे… हालांकि कई नेताओं की इच्छा ही मर गई है.. अब वे चाहने लगे हैं कि एक बार सभी बिना बत्ती के हो जाएं तो ज्यादा बेहतर होगा, वैसे भी कुछ नेता अब बुढापे की दहलीज पर पहुंच चुके हैं और मान रहे हैं कि उनका राजनैतिक जीवन समाप्त हो गया है…।

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