झूठ बोलने वालों के दिमाग से फुर्र हो  गया काटने वाले कौवे का खौफ !  . .. कीर्ति राणा

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ये भी कोई बात हुई ! सच बोलने वाले की बात पर यकीन नहीं किया जाता और झूठ बोलने वालों की मिट्टी भी सोने के भाव बिक जाती है। कवि-गीतकार विट्ठल भाई पटेल ने ‘झूठ बोले कौवा काटे’ को अपने अंदाज में लिखकर प्रसिद्धि तो पा ली लेकिन मुझे लगता है विट्ठल भाई के साथ ही झूठों को  काटने वाला वह कौवा भी ऊपर चला गया है। अब किसी को उस कौवे के काटने का डर नहीं रहा शायद इसीलिए झूठों की दुकान का कारोबार बुलेट ट्रेन की रफ्तार से चल पड़ा है।
यूपी के गोरखपुर स्थित बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ६९ लाख का भुगतान नहीं होने पर ऑक्सीजन की सप्लाय रोकने वाला ठेकेदार कई दिनों से भुगतान न होने पर कुछ भी कर देने का सच बोल रहा था पर फटाफट फैसले, तुरत-फुरत एक्शन लेने वाले योगी के अधिकारियों के कानों तक यह आवाज पहुंची ही नहीं । दिक्कत यह है कि कैमरा और एक्शन वाली मीडिया ने योगी हों या मोदी इन्हें अवतार के रूप में ऐसा बना दिया है कि गलती करें मातहत अधिकारी और इस्तीफे की अपेक्षा की जाए मुखिया से!
बीआरडी कॉलेज में प्राणवायु की सप्लाय रोकने से मरे बच्चे ठेकेदार के तो हैं नहीं जो उसे अपनी इस हरकत पर अफसोस हो, आखिर उसे भी तो अपने बच्चों को पालना है। भुगतान अब तक अटका रहा तो जाहिर है फाइल पर कुंडली मार कर बैठे अधिकारियों को भी अपने बच्चों के बेहतर भविष्य की चिंता रही होगी। रही बात मौत का शिकार हुए बीमार बच्चों की तो इनके परिवार वाले परवरिश ठीक से करते तो न बीमार होते, ना अस्पताल में दाखिल करना पड़ता और ना बाल ब्रह्मचारी योगी सरकार पर बाल हत्या का कलंक लगता।
मुझे तो डॉक्टर कफील खान की भागदौड़ भी समझ नहीं आई। अरे भई जब योगी सरकार मान ही नहीं रही कि ऐसी कोई घटना हुई है तो डॉक्टर खान की पीठ क्यों थपथपाएं, क्यों नाम का चयन करें आजादी पर्व पर सम्मानित किए जाने वालों की सूची में ?
सरकारें देश को भ्रष्टाचार मुक्त करने के भाव से काम कर रही हैं और काम के अभाव में निठल्ला चिंतन करने वाले यह सिद्ध करने में वक्त जाया कर रहे हैं कि भ्रष्टाचार कम नहीं हुआ है, एक हजार का नोट बंद होने से दो हजार का चलन में आ गया है। मेरे दिमाग मे आयडिया है कि लालकिले से दिए जाने वाले भाषण के लिए सुझाव भेज दूं कि भ्रष्टाचार को कम करने के लिए दो हजार के नोट बंद करके दो सौ, तीन सौ के नोट चलन में लाए जाएं।
बीआरडी कॉलेज की घटना में ऐसा कदम उठाते हुए ठेकेदार का दिल क्सों नहीं पसीजा? यह कहना आसान है कि हर आदमी में आधी औरत होती है। शिव का अर्द्धनारीश्वर, कृष्ण का छलिया रूप भी पूजनीय है, लेकिन आदमी में आधी औरत होने का मतलब यह तो नहीं कि उसका दिल औरतों वाला ही हो जाए। वो तो मां का ही दिल होता है जो अंजान-पराए बच्चे पर भी ममता का सागर उड़ेल देती है । आक्सीजन सप्लाय करने जैसा बिजनेस करने वाले ठेकेदार औरत जैसा दिल रखने लगें तो कर लिया कारोबार । वैसे भी प्यार और कारोबार में सब तरह की चाल जायज ठहराई जाती है। मर गए तो मर गए, बच्चे ही तो थे। कोई ये पहली घटना तो है नहीं। हर मामले में अव्वल रहने वाले ‘एमपी गजब है’ के इंदौर में भी तो एमवाय अस्पताल में एकदम ऐसा ही कांड हो चुका है। वहां ठेकेदार तो यहां डॉक्टर-कर्मचारी, यह तो मानना पड़ेगा कि लापरवाही के मामले में योगी सरकार के अमले ने एमपी से सीखने में तत्परता दिखाई। सीएम योगी यदि सफाई के मामले में इंदौर से सीखने की ललक दिखा सकते हैं तो उनके अमले ने एमवायएच से सीख कर क्या गलती की है? हां यदि केरल. बंगाल, पंजाब से कुछ सीखते तो योगी तत्काल एक्शन लेते कि विरोधी दल वाले राज्यों से सीखने की क्या जरूरत थी?
अब क्या करेगी योगी सरकार?हमारे यहां जैसे काबिल अफसर वहां होते तो मामला इतना तूल ही नहीं पकड़ता। खैर सारी गाइड लाइन तो इंदौर कमिश्नर-एमपी सरकार ने पहले से बना रखी है। यूपी सरकार ने पहला चरण यह कहकर पूरा कर भी लिया है कि बच्चों की मौत ऑक्सीजन के अभाव में नहीं हुई है। दूसरे चरण में जांच समिति का गठन करना है, समिति की रिपोर्ट में ऐसे ऐसे तथ्यों को सामने लाना है जिनमें ठेकेदार, बकाया भुगतान, नौकरशाही की ढिलाई जैसे बिंदुओं पर चर्चा ही न हो। अरे हां! इस बीच मीडिया मैनेजमेंट भी तो करना है पंद्रह अगस्त नजदीक तो है, तय से ज्यादा गुणगान के बिलों का हाथोंहाथ भुगतान ही तो करना है। जिस राज्य के मुख्यमंत्री में भविष्य के प्रधानमंत्री की झलक नजर आ रही हो उस सरकार के काबिल अफसरों के लिए यह सब करना कोई तनाव की बात नहीं है। वैसे भी खबरों के प्राइम टाइम में मोदी-योगी-चीन-पाक-कटी चोटी से आगे दिखाने को बचता ही क्या है? ऑक्सीजन के अभाव में मरे बच्चों या बेहतर पुनर्वास की मांग को लेकर अनशन करने वाली मेधा पाटकर में शहरी पाठकों की कहां इतनी दिलचस्पी रहती है। और तो और हमारे पीएमओ के लिए किसान आंदोलन से लेकर, मेधा का अनशन और इन बच्चों की मौत के मामले विचलित करने वाले होते तो आसुंओं में भीगी वो नीली चिड़िया जाने कितनी बार चीं चीं कर चुकी होती।

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