दशहरा मैदान से दशानन के ससुराल तक …. कहासुनी में कीर्ती राणा

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इंदौर के दशहरा मैदान पर हुआ प्रणाम इंदौर कार्यक्रम दो बार टलने के बाद तीसरी बार जाने कौन से चौघड़िये में हुआ कि सरकार की एक के बाद एक परेशानी बढ़ती ही गई।  किसान आंदोलन में गोलीचालन के बाद अन्य जिले भी भी हिंसा भड़क गई। मंदोदरी के मायके और रावण के ससुराल वाले शहर मंदसौर में सात किसान मारे गए । इसके बाद मुख्यमंत्री चौहान भोपाल के दशहरा मैदान में उपवास पर बैठ गए, उपवास से उठे तो फिर किसानों के आँसू पोंछने मंदसौर आना पड़ा। इस आंदोलन के चलते कांग्रेस भी सक्रिय हो गई। चौहान के उपवास पश्चात ज्योतिरादित्य सिंधिया तीन दिनी भोपाल सत्याग्रह पर बैठ गए। इस आंदोलन ने नर्मदा सेवा यात्रा की सारी पुण्याई पर भी एक तरह से पानी फेर दिया।  

महिला ब्रिगेड में पुलिस कप्तान सब पर भारी

प्रदेश में एक मात्र शाजापुर जिला ऐसा कहा जा सकता है जहाँ सभी प्रमुख पदों पर महिला विराजित हैं। इनमें भी पुलिस कप्तान मोनिका शुक्ला की तो ख़ुद सीएम समीक्षा बैठक में तारीफ़ कर चुके हैं किसान आंदोलन के दौरान उनके द्वारा ईंट का जवाब पत्थर से देने पर । एक तरह से नवदुर्गा के रूप हैं शाजापुर में, आप ख़ुद ही देख लीजिए- कलेक्टर अलका श्रीवास्तव, एसपी डा. मोनिका शुक्ला, एडीएम मीनाक्षी सिंह, एएसपी ज्योति ठाकुर, सीएमएचओ डा अनुसूइया गवली, जनपद अध्यक्ष बोंदीबाई, नपा अध्यक्ष शीतल भट्ट, जिला पंचायत अध्यक्ष कला बाई कुंडला और जिला आबकारी अधिकारी सुश्री श्यामलदास चंदेल। बस अब इस टीम के स्वागत-सम्मान का कोई कार्यक्रम हो तो अतिथि के रुप में साधना सिंह को ही लाना बाक़ी है।  

अतिथि तुम कब आओगे

मध्यप्रदेश में आठ महीने तो हो गए स्थायी राज्यपाल की घोषणा नहीं हुई है।  गुजरात के राज्यपाल ओपी कोहली के पास अतिरिक्त प्रभार है। गुजरात में उनकी इतनी व्यस्तता है कि मप्र कभीकभार ही आ पाते हैं। राजभवन की नज़र से देखा जाए तो किसान आंदोलन, सात मौतें क़ानून व्यवस्था की दृष्टि से इतनी बड़ी बात नहीं है कि राज्यपाल सरकार से रिपोर्ट माँगे। 

 अरुण को कक्काजी का टेका 

देशकांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव अपने बलबूते पर पाँच हजार लोग भी इकट्ठा कर लें, इस पर कोई विश्वास नहीं करेगा। अब 16जून को किसानों के समर्थन में खलघाट जाम करने में भाराकिमं अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा कक्काजी का समर्थन लिया है तो उसके पीछे भीड़ जुटाना भी कारण है। खलघाट उनके संसदीय क्षेत्र रहे खंडवा और भारत कृषक समाज के संस्थापक अध्यक्ष रहे पिता सुभाष यादव के गृह जिले खरगोन से भी जुड़ा है। खलघाट जाम की सफलता से इन दोनों जिलों में अरुण यादव की धाक जम जाएगी, कक्काजी तो टेका लगा ही रहे हैं।  

हाँ बाबा हाँ एक करोड़ ! 

कभी जब सांप्रदायिक दंगों में मारे जाने वाले व्यक्ति के परिवार को पाँच लाख तक सहायता मिल जाती थी तो जिंदगी से हार चुके लोग ऐसी किसी मौत की कामना और परिवार की मुफ़लिसी दूर होने का सपना देखने लग जाते थे। किसान आंदोलन में जो मारे गए उनके परिवारों के लिए एक करोड़ की सहायता कोई मायने नहीं रखती लेकिन निठल्ला चिंतन करने वाले ख़्वाब देख रहे हैं कि ऐसे किसी आंदोलन का शिकार होकर परिवार को करोड़पति कर जाएँ। 

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