पहलाज की फिल्म को लगा सरकारी कट  – रील रिपोर्ट में एकता शर्मा 

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  फिल्मकारों के लिए ये सप्ताहांत बेहद खुशनुमा रहा। सिर्फ इसलिए नहीं कि उनकी कोई फिल्म हिट हुई है या कोई फिल्म 100 करोड़ क्लब में शामिल हो गई! पहलाज निहलानी को फिल्म सेंट्रल बोर्ड के चेयरमैन पद से बर्खास्त किए जाने से बड़ी ख़ुशी उनके लिए कोई नहीं हो सकती! निहलानी को हटाने की प्रक्रिया भी अपमानजनक ही कही जाएगी। उन्हें पद से बर्खास्त किया गया। उनकी जगह नए चेयरमैन गीतकार प्रसून जोशी की नियुक्ति भी तत्काल कर दी गई। जब से निहलानी को सेंसर बोर्ड की जिम्मेदारी सौंपी गई, वे लगातार विवादों में बने रहे। अपने ढाई साल के कार्यकाल में उन्होंने फिल्मों में क़तर ब्योंत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी! इस वजह से निहलानी अपने पूरे कार्यकाल में फिल्मकारों के निशाने पर बने रहे।
  निहलानी ने अपने कार्यकाल में वो सब किया जो वे कर सकते थे। हाल ही रिलीज हुई फिल्म ‘जब हैरी मीट सैजल’ में भी उन्हें ‘इंटरकोर्स’ शब्द के उपयोग से आपत्ति थी। जब निर्देशक इम्तियाज अली ने सवाल जवाब किए तो उनके सामने कोई अटपटी सी शर्त रख दी गई। मजबूर होकर इम्तियाज अली ने इस शब्द बदलना ही ठीक समझा! निहलानी का सबसे ज्यादा विरोध ‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’ को लेकर हुआ। क्योंकि, सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म को पास इसलिए नहीं किया, क्योंकि उन्हें फिल्म भारतीय परिवेश में असंस्कारी लगी। ये तक कहा गया कि फिल्म में महिलाओं को गलत ढंग से दिखाने की कोशिश की गई है। बाद में बड़ी मुश्किल से इस फिल्म को सेंसर सर्टिफिकेट दिया गया।
    निहलानी ने अपने पद का सबसे ज्यादा दुरूपयोग ‘उड़ता पंजाब’ की रिलीज को लेकर किया। युवाओं में ड्रग्स की लत पर पर बनी इस फिल्म में दिखाया गया था कि पंजाब में ड्रग्स के इस कारोबार ने युवाओं की ज़िंदगी कितनी बर्बाद कर दी। लेकिन, निहलानी का सेंसर बोर्ड चाहता था कि फिल्म में ड्रग्स के कारोबार का जिक्र न हो, कुछ और बताया जाए। इस फिल्म में 80 कट की सिफारिश की गई थी। बाद में निर्माता-निर्देशक इस मामले को अदालत तक ले गए, तब फिल्म रिलीज हो सकी थी।
   भूत की कहानी पर बनी ‘फिल्लौरी’ के एक सीन को लेकर भी सेंसर के कैंची चलाई थी। फिल्म का हीरो अनुष्का शर्मा का भूत देखकर इतना डर जाता हैं कि बाथटब में हनुमान चालीसा पढ़ने लगता हैं। जबकि, सेंसर बोर्ड को आपत्ति थी कि बाथरूम में हनुमान चालीसा पढ़ते नहीं दिखाया जा सकता। इसलिए इस सीन को काटने को कहा गया था। ‘रमन राघव 2.0’ फिल्म में भी सेंसर ने 6 कट मारे थे। कहा गया था कि इसमें ज्यादा हिंसा है।
  अक्षय कुमार की चर्चित फिल्म ‘जॉली एलएलबी-2’ में लखनऊ के ज़िक्र से भी सेंसर को नाराजी थी। जबकि, फिल्म की कहानी ही लखनऊ की थी। गाने से लखनऊ शब्द हटाने को कहा गया था। हाल ही में नवाजुद्दीन सिद्दीक़ी की फिल्म ‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’ में भी ढेरो कट के आदेश दिए गए थे। यदि पहलाज निहलानी को हटाया नहीं जाता तो फिल्मकारों की ये पीड़ा बढ़ती ही जाती।
  बोर्ड के अध्यक्ष बनने के बाद निहलानी ने फिल्मों में 32 शब्दों के उपयोग पर ही आपत्ति उठाई थी। भारी विरोध के बाद इसमें से 16 शब्द हटाए गए। आज जबकि इंटरनेट की असीमित पहुँच के कारण सूचनाओं, विचारों, दृश्यों के साथ-साथ हर तरह की कला का निर्बाध संचार हो रहा है, सेंसर बोर्ड की उपयोगिता का कोई महत्व नहीं रह जाता। किसी फिल्मकार के रचे दृश्यों, संवादों और गीतों में काट-छांट करना उसकी कलात्मक अभिव्यक्ति पर अंकुश लगाने जैसा था। लेकिन, अब इस सबसे फिल्म बनाने वाले मुक्त हो गए। यही कारण है कि उनके लिए ये वीकेंड जश्न मनाने जैसा है।
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(लेखिका फिल्म समीक्षक है और ‘फिल्मों के 100 साल’ पर हुए शोध कार्यों से संलग्न रही है)
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