बन ही जाए – प्रेम थाना  — -रोमेश जोशी का व्यंग्य

0
59

ऊम्र आई। हम प्यार करने लगे। वे घूरने लगे। सतयुग, त्रेता, द्वापर से चला ये सिलसिला कलियुग में भी जारी है। शायद इसीलिए लोग इसे जमाने का दस्तूर मानने लगे हैं। – हम प्यार करेंगे – वे घूरेंगे।
त्रासदी यह है कि हम प्यार न भी कर रहे हों। हम बस मित्र हों। यों ही साथ चल रहे हों। कॉलेज, ऑफिस, मार्केट जाने का समय एक होने के कारण करीब दिखाई देते हों, तो भी घूरने के विशेषज्ञ पक्का ताड़ लेते हैं कि हमारे बीच कुछ-कुछ चल रहा है। और जो पक्के तौर पर गलत ही है।
ऐसा भी हुआ कि गीताप्रेस की दुकान पर लड़का ‘हनुमान चालीसा’ खरीदने गया और लड़की ‘दुर्गा चालीसा’। उनके बिल साथ-साथ बने और इक-दूजे से अनजान वे साथ-साथ वापस लौटे। लेकिन सौभाग्य/दुर्भाग्य से उस दिन था वेलेण्टाइन। अस्तु, घूरनेवालों ने पकड़कर ऐसी चेनल-छाप धुलाई की कि बदनाम होकर दोनों इक-दूजे से प्यार करने लगे, फिर शादी भी की। थैंक्यू वेलेण्टाइन-पिटाई-समूह, जो केवल घूरना-ताड़ना-प्रताड़ना जानते हैं। और जिन्होंने हमें मिला दिया।
पहले ऐसा नहीं था। दाऊ बलराम को जब सुभद्राहरण की सूचना मिली, तो वे आग-बबूला हो गए। शायद ‘ऑनर किलिंग’ का केस बना बैठते। पर जैसे ही पता चला कि अर्जुन के रथ की वल्गा यानी लगाम खुद सुभद्रा ने थाम रखी थी, उनका गुस्सा ठण्डा हो गया। लेकिन आज के इन ‘मॉरेल पोलिसिंग’ करनेवालों में न तो वो नैतिक ऊँचाई है और न प्रेम के प्रति वो सम्मान। मैंने इन घूरनेवालों, इन नैतिक-पुलिस वालों को घूर-घूर कर जो अध्ययन किया, उसका निष्कर्ष बस इतना है कि इनमें से लगभग सभी इस ग्रन्थि के शिकार हैं कि – ‘‘ हाय! वहाँ हम न हुए! ’’
इसलिए, दोनों पार्टियों का निकट अध्ययन करके सुझाव दे रहा बल्कि माँग कर रहा हूँ कि अब तो देश में प्रेम थाना खोल ही दिया जाए। जहाँ जाकर दोनों पक्ष अपनी-अपनी एफआईआर दर्ज करवा सकें। पक्ष 1 – माननीय थानेदार साब, पक्की सूचना है, वो दोनों प्यार करते हैं। कृपया, नैतिक-ठुकाई करने में हमारा सहयोग करें। पक्ष 2 – साब, हम प्यार करते हैं, लेकिन वे मान नहीं रहे हैं। अतएव, कृपा कर, आप ही हमारी ठुकाई कर दें। आदि। और पक्ष 3 – यानी थानेदार डपटकर कहे, ‘‘ आपने एफआईआर दर्ज करवाए बगैर प्रेम कैसे कर लिया जी? ’’

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here