सुलझानेकी कोशिश में ही सरकार उलझती गई! ….सौ टंच में हेमंत पाल

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    राजनीति कभी-कभी अचानक ऐसे करवट बदलती है कि सारा परिदृश्य ही बदल जाता है। ये मध्यप्रदेश में पिछले दिनों जो कुछ घटा उसे देख और समझकर समझा जा सकता है। ये सारी घटनाएं राजनीति विज्ञान के छात्रों के लिए केस स्टडी भी हो सकती है। राज्य सरकार जिस किसान आंदोलन को अदना सा संकट समझ रही थी, उस आंदोलन की विकरालता ने सरकार की चूलें हिला दी! जो भाजपा सरकार संवेदनशीलता मामले में तेरह साल में जनता के दिल में जगह बना चुकी थी उसे जनता ने सबसे ज्यादा असंवेदनशील समझने में तेरह मिनट नहीं लगाए! जो कांग्रेस तेरह साल से प्रदेश की राजनीति में गेस्ट एपीयरेन्स जैसे रोल में थी, उसका रोल अहम बनकर उभर आया। इतने पर भी अभी सरकार की उलझन खत्म नहीं हुई! मामले को सुलझाने की कोशिश में सरकार जिस तरह उलझती गई, उसने प्रदेश की भाजपा राजनीति को दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है।
    मध्यप्रदेश में जिस तरह का घटनाक्रम घटा वो पूरी तरह अनपेक्षित था। किसानों का सामान्य समझा जाने वाला आंदोलन इतना उग्र हो जाएगा! उसकी उग्रता सरकार को हिला देगी, ये शायद कभी सोचा नहीं गया होगा! ये भी उसी अनपेक्षित पटकथा का हिस्सा रहा कि हाशिये पर पड़ी कांग्रेस अचानक लाइम लाइट में आ गई। तेरह साल तक सफल मुख्यमंत्री कहे जाने वाले शिवराज सिंह चौहान सबके निशाने पर थे। जो मीडिया और सोशल मीडिया भाजपा और प्रदेश सरकार के गुणगान करते थकता था, वहाँ नकारात्मकता की बाढ़ आ गई! सरकार के सारे मीडिया मैनेजर इस बदलाव को मैनेज करने में फेल हो गए! वे समझ ही नहीं सके कि सरकार विरोधी ख़बरों और कमेंट्स कहाँ से बरस पड़े? आश्चर्य की बात ये समझी जाना चाहिए कि जिन्हें सरकार और भाजपा का सपोर्टर माना जाता था वो सारे मीडियामेन गायब नजर आए!
  ध्यान देने वाली बात है कि ये तात्कालिक घटना पर लोगों की सहज प्रतिक्रिया थी या पहले से लोगों के दिलों में भरे गुस्से का निस्तार था? क्योंकि, जो हुआ उसमें किसानों के साथ आम लोगों की मानसिकता को समझने में भी सरकार फेल ही रही! एक मुद्दे को सहेजने की कोशिश में सरकार से बार-बार गलतियां हुई! मंदसौर की घटना के बाद भी सरकार ने जो फैसले लिए वो भी ऐसे नहीं थे, जो मसले का निराकरण करते दिखाई दिए! लोगों का ध्यान हटाने के लिए सरकार ने कांग्रेस पर ठीकरा क्या फोड़ा, सरकार के सामने नई मुसीबत खड़ी हो गई! कांग्रेस को आंदोलन से जोड़ने से कांग्रेस खलनायक बनने के बजाए हीरो बन गई! भाजपा जैसी पार्टी इसका पूर्वानुमान नहीं लगा सकी, ये समझने वाली बात है!
   कांग्रेस जो एक दशक से नेपथ्य में चली गई थी, अचानक सामने आ गई! जिस किसान आंदोलन से उसका कोई वास्ता नहीं था, वो मुद्दा उसके हाथ आ गया और उसने उसका पूरा फ़ायदा उठाने में कोई कसर भी नहीं छोड़ी! राहुल गाँधी का मंदसौर आने की कोशिश करने की भाजपाई सोशल मीडिया मैनेजर जितनी भी खिल्ली उड़ाने की कोशिश करें, पर सच ये है कि कांग्रेस को राहुल के इस कदम से जो सहानुभूति मिलना थी, वो तो मिल गई! इसके बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बचा खुचा मैदान मार लिया! उन्हें मंदसौर जाने से रोकने की सरकारी कोशिशों से भी गलत संदेश गया है। इससे ये लगा कि सरकार कुछ छुपाना चाहती है। इसके बाद मुख्यमंत्री के 27 घंटे के उपवास का जवाब देने के लिए सिंधिया का 72 घंटे का सत्याग्रह कहीं ज्यादा कामयाब रहा।
  जो कांग्रेस अभी तक तीन-चार क्षत्रपों में बंटकर आपस में ही तलवार भांज रही थी, वो अचानक राजनीतिक अस्त्र-शास्त्रों से लेस सेना की शक्ल में सामने आ गई! कांग्रेसी नेताओं के चेहरे अचानक चमक उठे! जिस पार्टी के पास अगले चुनाव में उतरने के लिए कोई मुद्दा नहीं था! शिवराज सिंह को चुनौती देने का मौका नहीं मिल रहा था, उस कांग्रेस ने बराबरी की लड़ाई की तैयारी कर ली! इसी सब का नतीजा है कि शुरू के तीन दिन जिस किसान आंदोलन में केशरिया दुपट्टे नजर आ रहे थे, वहां बाद में कांग्रेस का तिरंगा कैसे लहराने लगा? भाजपा और सरकार के लिए ये सोच और चिंतन का विषय है कि उससे कहाँ, कब और कैसी गलती हुई? क्योंकि, ये तो सर्वमान्य सत्य है कि यदि कांग्रेस को आंदोलन से जुड़ा नहीं बताया जाता तो ये पार्टी कहीं आसपास भी नहीं थी! लेकिन, भाजपा को हुए इस खामियाजे की भरपाई कैसे हो ये लाख टके का सवाल है!
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(लेखक ‘सुबह सवेरे’ इंदौर के स्थानीय संपादक हैं)

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