अगले बन्द की योजना …रोमेशजोशी का व्यंग्य

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‘‘ खूब मजा आया आज तो, खूऊब। मैंने जो पहला पथ्थर सन्नाया ना, वो सीधा जाकर हेडसाब के हेलमेट पे लगा। ठाक की आवाज आई और मची भगदड़। ’’ दिन भर भारत बन्द की सक्रियता के बाद शाम को सुस्ताते हुए पहले स्वयंसेवक ने कहा।

‘‘ अरे, ये तो कुछ भी नहीं है। गांधी मार्ग पर हमने जब रिक्शावालों को रोका, तो सवारियाँ उतरकर ऐसे भागी कि बस। ’’ दूसरे निष्ठावान कार्यकर्ता ने गर्व से कहा, ‘‘ याद करके अभी भी हँसी आ रही है। ’’

‘‘ सवारियों का भागना तो तिलक प्रतिमा पर देखना था। सूट पहने हुए एक बुड्ढा टेक्सी से यूँ कूदा। ’’ तीसरे ने एक्शन रिप्ले दिखाया।

‘‘ एँह! ’’

‘‘ सच्च, सूटकेस खींचकर सिर पर ऐसे रखा जैसे ठेठ गाँववाला हो। और भागा सरपट। उसके साथ बुढि़या भी थी, पर उसको ध्यान ही नहीं रहा कि बुढि़या साथ है। बुड्ढी उसके पीछे दौड़ी तो यों कीचड़ में लम्बी हो गई। ’’

‘‘ मजेदार रहा। दिन भर हो गया। ’’

‘‘ मैं तो वहाँ से स्टेशन चला गया था। चार ट्रेनें रोकी। खूब दौड़ाया पुलिसवालों को। ’’

‘‘ मुझे तो पता ही नहीं था कि बस को आगे से जलाते हैं। मैंने आतंकवाद का जलता हुआ पुतला पिछली सीट पर डाल दिया। आग तो लगी, पर बुझा दी। ’’

‘‘ भैया, मदनदादा कितने नाराज हो रहे थे। बस जलाना आता नहीं और बन्द कराने चले आए। देखना, अभी दस बजे मीटिंग में फिर बरसेंगे। ’’

‘‘ यही तो गड़बड़ हो जाती है, बस एक दिन के नोटिस पे बन्द करो तो। कुछ सोच भी नहीं पाते कि कहाँ क्या करना है। ’’

‘‘ और नहीं तो क्या! अगर मदनदादा या श्यामजी में से किसी ने भी ऐसा-वैसा कुछ बोला, तो अपन तो सीधा कह देंगे – आगे से पाँच-छे दिन के नोटिस के बिना बन्द का आदेश स्वीकार नहीं किया जाए। ’’

‘‘ मैं तो कहता हूँ, कम से कम तीन दिन का नोटिस दो, फिर देखो। बस-ट्रेन तो क्या हम नल, बिजली, अस्पताल सब बन्द न करवा दें, लोगों को घर के अन्दर ताला लगाकर बैठने को मजबूर न कर दें तो कहना। कम से कम तीस जगह आग लगाकर बताएँ। ’’

‘‘ आप लोग भी कैसी बेहूदी बातें कर रहे हैं? क्या आप पाकिस्तान की आदतों को नहीं जानते? आइएसआई की हरकतों की आपको कोई सूचना मिलती है क्या? कौन सा आतंकवादी कब वारदात करेगा, आप जरा भी कल्पना कर सकते हैं क्या? और उसमें से कौन सी वारदात ‘भारत बन्द’ की घोषणा करने लायक है, यह निर्णय करने का अधिकार आपके पास है क्या? ’’

‘‘ जो मन में आया बोलते चले जाते हैं, इसी को तो अनुशासनहीनता कहा जाता है। ’’ कहा उसने जो उनमें से वरिष्ठ तो था ही, छोटा-मोटा पदाधिकारी भी था और महसूस करता था कि कनिष्ठों को सम्हालकर रखना उसका दायित्व है।

‘‘ बात तो आप ठीक ही कह रहे हैं, लेकिन जरा सोचिए, अगली वारदात का पता चलाना अगर सम्भव होता तो हमारा बन्द कितना ज्यादा सफल रहता। लोग एक दिन के लिए जीना भूल जाते। ’‘ स्वयंसेवक ने सम्भावना प्रकट की।

‘‘ मेरा तो कहना है कि अगला भारत बन्द चाहे दस दिन बाद हो या दस महीने बाद, हमें उसके लिए अभी से विस्तृत योजना तैयार कर लेनी चाहिए। थोड़ी बहुत सामग्री भी एकत्र कर लेनी चाहिए। क्योंकि पुतले जलाने, आगजनी करने, पथराव करने और महत्वपूर्ण सरकारी संस्थानों तक पर्याप्त मात्रा में भीड़ पहुँचाने में समय भी लगता है और पैसा भी। ’’ कनिष्ठ कार्यकर्ता ने सुझाव दिया।

‘‘ बिलकुल ठीक कहा आपने, अगर वे गहन योजना बनाकर वारदात कर सकते हैं, तो क्या हम अपनी नाराजी जताने के लिए ऐसे भारत बन्द की योजना नहीं बना सकते, जो देश की अर्थव्यवस्था को एक दिन के लिए बिलकुल ठप्प कर दे! पूरे देश की ऐसी-तैसी कर दे। ’’

‘‘ हमें प्रयास तो करना चाहिए। ’’ कार्यकर्ता ने कहा और शेष सभी के साथ टिप्पणी के लिए वरिष्ठ की ओर देखने लगा।

जैसा कि ऐसी अनिर्धारित बैठकों में होता है, वरिष्ठ ने समय सूचिका यानी घड़ी की ओर देखा और कहा, ‘‘ बैठक का समय निकट आ रहा है। मैं सोचता हूँ, हमें अब चलना चाहिए। आप चाहें तो बैठक में अपने विचार रख सकते हैं। मुझे विश्वास है हमारे नेतागण आपके विचारों पर ध्यान देंगे और अगला भारत बन्द आयोजित करने की उचित कार्ययोजना बनाने के लिए आवश्यक निर्देश आदि प्रदान करेंगे। चलिए। ’’

और बन्द की उस शाम आगामी बन्द को और घातक बनाने के विश्वास के साथ सारे कार्यकर्ता तथा स्वयंसेवक बैठक स्थल की ओर रवाना हुए।

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