अभिमानासुर का नाश करने वाला है श्रीगणेश का धूम्रवर्ण अवतार

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भगवान श्रीगणेश का धूम्रवर्ण नामक अवतार ​अभिमानासुर का नाश करने वाला शिव ब्रहम का स्वरूप हैं । इनका वाहन भी मूषक है ।
एक बार ब्रहमा ने सूर्य को कर्माध्यक्ष का पद दिया इस पद को प्राप्त करते ही सूर्य के मन में अंहकार आ गया और उसी समय आई छीकं से अंहतासूर का जन्म हुआ। दैत्यगुरू शुक्राचार्य से गणेशमंत्र की दीक्षा प्राप्त कर वह वन में जाकर उनकी उपसना करने लगा। भगवान द्वारा इच्छित वर मागंने पर उसने संपूर्ण ब्रह्माण्ड का राज्य , अमरत्व , आरोग्य और अजय होने का वरदान मांगा जो भगवान ने उसे दे दिया ।
गुरू शुक्रार्चाय ने उसे दैत्यों का राजा बना दिया।उसके दो पूत्र गर्व और श्रेष्ठ हुए। अंहतासुर ने विश्वविजय करने के उद्देश्य से धरती, स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया और उसने देवताओं को परास्त कर अपना राज्य कायम कर लिया । पराजित और असहाय देवता भगवान शंकर और ब्रह्मा की सलाह से श्री गणेश की अराधना करने लगें। भगवान ने प्रसन्न होकर धूर्मवर्ण के रूप में अव​तरित हुए और उनका संकट दूर करने की बात कही ।
भगवान ने नारद को दूत के रूप में अंहतासुर के पास भेजा और देवताओं पर अत्याचार बंद कर शांति से रहने को कहा , लेकिन उसने युद्व प्रांरभ कर दिया धूम्रवर्ण ने क्रोधित होकर असुर सेना पर अपना पाश छोड दिया और पाश ने असुरों के गले में लिपट लिपट कर उन्हें यमलोक भेजना प्रांरभ् कर दिया निराश हताश अंहतासुर गुरू शुक्रार्चाय के पास पहुंचा । उन्होंने उसे धूर्मवर्ण की शरण में जाने को कहा इस पर प्रभुकी शरण में आया और क्षमा मांगी । भगवान ने उसे माफ करते हुए कहा जहां मेरी पूजा ना होती हो वहा जा​कर रहों ।

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