आज भी दादा दयालु के मूछों का रूतबा बना हुआ… गुस्ताखी माफ़

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navneet shuklaशहर में जो लोग यह सोच रहे हैं कि दादा दयालु के डर में कोई कमी आई है तो वे गलत समझ रहे हैं। आप कह सकते है मुछें हो तो दादा दयालु जैसी, हालांकि वो रखते नहीं है पर उनकी मुछों का डर हमेशा बरकरार रहता है। आईटीआई ग्राउंड पर हो रहे गरबों में इन दिनों रात 11 बजे बाद कई अधिकारी धीरे-धीरे बंद कांच की कारों में पहुंच रहे हैं। अभी तक संभागायुक्त से लेकर आयुक्त तक यहां कैलाश विजयवर्गीय के भजन से लेकर दादा दयालु के गगन तक को निहार चुके हैं। मंच पर देर रात नेता कम अधिकारी ज्यादा दिखाई दे रहे हैं। हालांकि दादा दयालु को इन सब बातों से बहुत ज्यादा अंतर नहीं पड़ता है। यूं भी कहा जाता है कि राजा राज्यम पूज्यते, ज्ञानी देशम पूज्यते और दुष्ट सर्वेत्र पूज्यते। दादा दयालु का अधिकारियों में डर इतना है कि वे पहले तो नजर उठाते ही नहीं हैं और यदि नजर उठ जाए तो अच्छा खासा अधिकारी महाबली से बाहुबली की श्रेणी में आ जाता है। पर जो भी हो इसी बहाने कम से कम अधिकारी माता की भक्ति में कुछ समय तो निकाल रहे हैं। वैसे भी इन दिनों कहा जाता है कुछ समय तो गुजारिए मिल क्षेत्र में। हालांकि यह भी सच है कि जहां शहर के दूसरे गरबों में भीड़ की भारी कमी है, वहीं दादा के गरबों में रात 1 बजे तक पैर रखने की जगह नहीं दिखाई देती है। न किसी को निमंत्रण, न किसी को आमंत्रण फिर भी लोग चले आ रहे हैं।
दौरे में अधिकारी नदारद मिले…
दो दिन पूर्व पूरे जोश खरोश के साथ कलेक्टर अचानक सांवेर का दौरा करने पहुंचे। इनके साथ डीआईजी भी थे। सांवेर पहुंचने के बाद सारा जोश ठंडा हो गया। यहां पर नियुक्त एसडीएम, सीएमओ, तहसीलदार, नदारद थे और एक ओर कई लोग ड्यूटी से गायब मिले। तिलमिलाए अधिकारी समझ गए उनका डर अधिकारियों पर नहीं है। अब एक दो दिनों में नोटिस जारी किए जाने की तैयारी की जा रही है।
एमपीसीए के पदाधिकारियों की कॉलर और खड़ी..
भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष अनुराग ठाकुर ने एमपीसीए के चेयरमैन ज्योतिरादित्य सिंधिया और होलकर स्टेडियम में उमड़ी भीड़ की क्या तारीफ कर दी, एमपीसीए के पदाधिकारियों की कॉलर और कडक़ हो गई है और उनके पांव और जमीन पर नहीं टिक रहे हैं। यूं तो जैसे भी एमपीसीए को वन डे या कोई मैच मिलता है तो उनके भाव यूं ही आसमान पर रहते हैं, उनकी हालत यह होती है कि अपने परिवारजनों से भी टेड़े होकर बात करते हैं और शहर के लोगों की बात ही अलग है, उनसे तो वे बात करना भी उस समय वे पसंद नहीं करते हैं। हालांकि बाद में फिर जहां मिलते हैं, लोग उनकी लू उतारते देखे जा सकते हैं, पर इज्जत और बेइज्जती दोनों के इस कदर आदि हो चुके हैं कि इन्हें कोई अंतर नहीं पड़ता है।

नवनीत शुक्ला 

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