आदर्श रेलवे स्टेशन ——रोमेशजोशी का व्यंग्य

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बरसों पहले जब रेल के डिब्बे में ‘नोटिस’ शब्द का हिन्दी अनुवाद ‘काबिले तवज्जोह इत्तला’ हुआ करता था और ‘सूचना’ शब्द के हिन्दी में उपस्थित होने की सूचना रेलवई के अनुवाद करने वालों तक नहीं पहुँची थी, उन्हीं दिनों हिन्दी के विकट प्रेमियों ने ‘रेल’ और ‘स्टेशन’ जैसे शब्दों के घोर हिन्दी अनुवाद करने का प्रयास किया था।

लेकिन लौह-पथ-गामिनी, वाष्प चलिता, अग्निरथ तथा लौहपथिका विश्राम स्थल जैसे सूक्ष्म हिन्दी अनुवाद के बाक्स आफिस पर बुरी तरह पिटने के बाद इस दिशा में प्रयोग बन्द हो गए। स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह विराम पा गया। छुक-छुक गाड़ी जैसे बचकाने अनुवाद को भी सीमित सफलता के बाद फ्लाप घोषितकर दिया गया और रेलगाड़ी रेलगाड़ी रही, स्टेशन स्टेशन बना रहा।

हिन्दी के माध्यम से क्रान्ति करने का बट्ठर सपना लेकर चलनेवाले धीरे-धीरे मानने लगे थे कि रेल विभाग की मालिकी की यह जमीन वह धरती है, जहाँ कोई बदलाव नहीं हो सकता, वह हमारे लिए जरा भी नहीं बदलेगी।

लेकिन अभी जब देश के कुछ रेलवे स्टेशनों को ‘आदर्श’ बनाने की घोषणा की गई, तो पहली आशंका मुझे यही हुई कि ये लोग नाम बदलेंगे, क्योंकि हमारे यहाँ शुरूआत का आदर्श या आदर्श की शुरूआत अनुवाद और नाम बदलने से ही होती है। इसलिए मैंने अपने आशंका उन्मूलन कार्यक्रम को लागू करते हुए रेलवई के अफसर से पूछा, ‘‘ ये स्टेशन शब्द का कोई नया अनुवाद होने जा रहा है क्या? ’’

‘‘ नहीं तो . . . ! ’’

‘‘ फिर ये आदर्श स्टेशन क्या बला है? ’’

‘‘ आदर्श स्टेशन यानी आईडियल स्टेशन, मॉडल स्टेशन। ’’ उसने मुझे अनुवाद द्वारा समझाने की शुरूआत की। पढ़े-लिखे होने का तकाजा था कि मैं अंग्रेजी में समझाए जाने पर तत्काल समझ जाता, लेकिन मैं तो सवाल पूछने की गँवारियत पर उतारू था, ‘‘ मगर इसमें होगा क्या? ’’

‘‘ होगा क्या! वही होगा, जो आदर्श स्टेशन में होना चाहिए। ’’

‘‘ मतलब, क्या उसमें रेलें समय पर चलेंगी? ’’

‘‘ नहीं भाई, स्टेशन आदर्श होगा, रेल नहीं। ’’

‘‘ तो क्या उसमें टिकिट जल्दी मिलेगा या सस्ता मिलेगा? ’’

‘‘ नहीं, टिकिट के लिए भी वैसी ही लाइन लगानी पड़ेगी, रेट भी वही होगा। ’’

‘‘ क्या डिब्बे में घुसने के लिए धक्का-मुक्की नहीं करनी पड़ेगी? ’’

ः‘ अजी, जब रेल में भीड़ होगी, तो धक्का-मुक्की भी होगी ही। उसमें आदर्श स्टेशन भला क्या कर सकता है? ’’

‘‘ क्या प्लेटफार्म की बेंचों के खटमल साफकर दिए जाएँगे या विश्रामगृह में ज्यादा जगह होगी? ’’

‘‘ खटमलों का साफ होना तो असम्भव है। साफ करो, तो फिर हो जाते हैं। इसलिए हमने साफ करना बरसों से बन्दकर दिया है। और विश्रामगृह में जितनी जगह है, उसे भी बढ़ाया नहीं जा सकता। ’’

‘‘ तो क्या आदर्श स्टेशन ज्यादा साफ रहेगा? ’’ मैंने थककर सवाल किया।

‘‘ आप तो पीछे ही पड़ गए भाई। अरे, आदर्श स्टेशन आदर्श होगा, कह देने से ही बात स्पष्ट हो जाती है। ’’

‘‘ नहीं होती। ’’ मैंने जिद के साथ कहा, ‘‘ यूनिवर्सिटी आदर्श प्रश्नपत्र निकालती है, पर वे आदर्श नहीं होते, आदर्श शिक्षा नीति घोषणा के बाद ही आदर्श नहीं रहती, आदर्श . . । ’’

‘‘ यह शिक्षा का क्षेत्र नहीं है भाई, रेलवे है। ’’ अफसर का विभागीय दम्भ जाग गया, ‘‘ सुनो, आदर्श रेलवे स्टेशन पर वीआईपी लोगों के लिए अच्छी व्यवस्था रहेगी। ’’

‘‘ मतलब, स्टाल पर मिलनेवाली चाय की क्वालिटी सुधर जाएगी? ’’

‘‘ चाय तो वैसी ही मिलेगी, पर वह जिस कप में दी जाएगी, उस पर लिखा होगा, आदर्श रेलवे स्टेशन। ’’

‘‘ और साफ-सफाई? ’’

‘‘ साफ तो अभी है स्टेशन। लोग वापरते हैं, तो गन्दा हो जाता है, हम क्या करें? आदर्श रेलवे स्टेशन भी गन्दा तो रहेगा ही। ’’

‘‘ गोडाउन में चोरी-चकारी रुक जाएगी क्या? ’’ मैंने आगे पूछा।

‘‘ कैसे रुक जाएगी? यह तो मानवीय गुण है और हाँ, रिजर्वेशन की ब्लेक की दरें घटने की भी कोई गुंजाइश नहीं है। रेलवे पुलिस का चरित्र भी नहीं बदलेगा। और कुछ पूछना है? ’’ अफसर ने खीझकर कहा।

‘‘ बस यह बता दीजिए कि आदर्श स्टेशन में होगा क्या? ’’

‘‘ इतना सब बताया तो . . . कुछ पंखे, कुछ लाइटें बढ़ जाएँगी। उधर आगे की तरफ कुछ पौधे रोप दिए जाएँगे। स्टेशन एक बार और पेण्ट कर दिया जाएगा। ’’

‘‘ बस! ’’ मैंने पूछा।

‘‘ हाँ बस! अब आप जा सकते हैं। ’’ कहते हुए उन्होंने बाहर के दरवाजे की ओर इशारा कर दिया। चला आया मैं। आदर्श रेलवे स्टेशन के क्लाक रूम, पूछताछ कक्ष, कर्मचारियों के व्यवहार आदि के बारे में सवाल पूछने की इच्छा मन में रह गई।

मैं उन्हें यह सुझाव भी देना चाहता था कि जब आदर्श के रूप में स्टेशन पर कुछ पौधे ही लगाने हैं, तो इसे ‘पर्यावरण स्टेशन’ का नाम क्यों नहीं देते? ज्यादा अच्छा लगेगा। आजकल चार पौधे रोपकर पर्यावरण के भजन गाने का फेशन है। खेर, कभी मौका मिलेगा, तो यह सुझाव भी दूँगा।

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