इन दिनों चौतरफा हमलों से घिरे हैं शिवराज?  …सौ टंच  में हेमंत पाल

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मध्यप्रदेश में भाजपा की हार और चौथी बार सरकार न बना पाने के मलाल के बाद सबसे बड़ा सवाल था कि शिवराजसिंह चौहान किस भूमिका में नजर आएंगे? इस सवाल का जवाब अंततः मिल गया। उन्हें भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया। सुनने में उपाध्यक्ष का पद बड़ा और प्रतिष्ठित लगता है और है भी! लेकिन, शिवराज सिंह के कद के अनुरूप नहीं! 13 साल मुख्यमंत्री रहने के बाद पिछले एक महीने में उनके साथ पार्टी ने जो कुछ किया वो ये समझने के लिए बहुत है कि भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व उनके साथ कैसा सुलूक कर रहा है! कई सारी अफवाहों के बीच अब ये सुना जा रहा है कि उन्हें लोकसभा का चुनाव लड़वाने की तैयारी है! लेकिन, विदिशा से नहीं जो उनकी अपनी सीट है! उन्हें छिंदवाड़ा जैसी चुनौती वाली सीट से उतारा जा सकता है।    
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  विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद जब भाजपा बहुमत के मैजिक फिगर से सात कदम दूर रही, तो सबसे पहले शिवराजसिंह चौहान ने मतदाताओं के प्रति ‘आभार यात्रा’ निकालने का सिक्का उछाला था! यहाँ तक कि रीवा से यात्रा निकालकर रोड-मैप भी बना लिया गया था। दरअसल, ये शिवराजसिंह का तयशुदा फार्मूला है! किसी भी मुद्दे पर वे बिना सोचे-समझे यात्रा के लिए निकल पड़ते हैं। ‘आभार यात्रा’ भी उसी फॉर्मूले का हिस्सा था! लेकिन, अभी उनकी बात भी पूरी नहीं हुई थी कि पार्टी के दिल्ली दरबार ने उन्हें ऐसा कुछ भी करने से मना कर दिया। तर्क यह दिया गया कि जब मतदाताओं ने बहुमत ही नहीं दिया, तो आभार किस बात का? बात सही भी थी! इसके बाद भी शिवराजसिंह अपनी यात्रा की आदत से बाज नहीं आए और अकेले ही मेलजोल की यात्रा पर निकल पड़े! अब भला पार्टी उन्हें ऐसा कुछ करने से तो रोकने से रही!
   इसके बाद संभावना जताई गई थी, कि पार्टी उनके राजनीतिक अनुभव और प्रशासनिक समझ को देखते हुए विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी देगी! लेकिन, अफ़सोस ये भी नहीं हुआ! पार्टी ने उनके नाम पर विचार तक नहीं किया! स्थिति ये हो गई कि शिवराजसिंह को खुद ही आगे बढ़कर कहना पड़ा कि वे खुद ही नेता प्रतिपक्ष बनना नहीं चाहते! कुछ अख़बारों में तो बकायदा इस आशय की ख़बरें भी छपी कि शिवराजसिंह ने ही नेता प्रतिपक्ष का पद लेने से इंकार किया है। बताते हैं कि उनसे इस बारे सलाह-मशविरा तक नहीं किया गया।
  कहते हैं कि जब वक़्त ख़राब हो तो ऊंट पर बैठे आदमी को भी कुत्ता काट लेता है। कुछ ही वाकया शिवराजसिंह के साथ भी हो रहा है। वे राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ मेलजोल बनाकर चल रहे हैं, पर कई बार दूसरों के बयान उनके लिए नुकसान का कारण बन जाते हैं। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार के बाद पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक और पूर्व केंद्रीय मंत्री संघप्रिय गौतम ने 2019 में केंद्र की सत्ता में भाजपा की वापसी के लिए सरकार और संगठन में बदलाव की हिमायत की। उन्होंने योगी आदित्यनाथ को हटाकर राजनाथ सिंह को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री और शिवराज सिंह चौहान को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष और नितिन गडकरी को उप-प्रधानमंत्री बनाने का बिन माँगा सुझाव दे डाला! यानी बैठे-ठाले शिवराजसिंह को अमित शाह को मुकाबले में खड़ा कर दिया। वास्तव में ये उनके फायदे वाली नहीं, बल्कि नुकसान वाली बात है। इस वजह से वे अमित शाह कि आँख की किरकिरी जरूर बन गए।

चुनाव में हार के बाद शिवराजसिंह चौहान ने अपने विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं को निश्चिंत रहने का आश्वासन भी बेहद अनूठे स्टाइल से दिया था। उन्होंने अपने निर्वाचन क्षेत्र बुधनी की जनता को संबोधित करते हुए कहा ‘आगे क्या होगा, इस बात की चिंता न करें। क्योंकि टाइगर अभी जिंदा है।’ उनके इस बयान की भी खूब खिल्ली उड़ी! दिग्विजय सिंह से लगाकर अरुण यादव तक ने इस बयान के जमकर मजे लिए। दिग्विजय सिंह ने तो कहा कि इस टाइगर को अब संरक्षण की जरुरत है। कहने का मतलब ये हुआ कि शिवराजसिंह ने पिछले महीनेभर में जो किया या बोला उसे गंभीरता में नहीं, बल्कि मजाक में ज्यादा लिया गया।

  सदन में विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव को लेकर भी जो कुछ घटा, उस कारण भी शिवराजसिंह को नीचा देखना पड़ा! परंपरा के अनुसार तय हुआ था कि अध्यक्ष पद कांग्रेस लेगी और उपाध्यक्ष पद भाजपा को दिया जाएगा और इसके लिए चुनाव नहीं होगा! लेकिन, शिवराजसिंह को न जाने क्या सूझा और उन्होंने भाजपा के वरिष्ठ विधायक कुंवर विजय शाह का परचा अध्यक्ष पद के लिए भरवा दिया। ये जानते हुए भी कि कांग्रेस की बुलाई बैठक में 120 विधायक मौजूद थे। कांग्रेस ने भी इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया और एनपी प्रजापति को अध्यक्ष निर्वाचित करवा लिया। इसके बाद विधानसभा अध्यक्ष पद के लिए अपनी पार्टी के उम्मीदवार के नाम का प्रस्ताव पेश न करने को लेकर भाजपा ने सदन से वॉकआउट कर दिया। सारे विधायकों को पैदल मार्च कराते हुए शिवराजसिंह राजभवन तक भी गए! उनकी मांग थी कि अध्यक्ष का निर्वाचन फिर से हो! शिवराज ने इसे लोकतंत्र की हत्या करार दिया। इस फिजूल के प्रोपोगंडे का असर ये हुआ कि कांग्रेस ने भाजपा को उपाध्यक्ष पद भी नहीं दिया और अपनी विधायक हिना कांवरे को सदन का उपाध्यक्ष बना दिया।
  अब एक नई चर्चा ये भी शुरू हो गई है कि पार्टी शिवराजसिंह चौहान को लोकसभा चुनाव में उतारना चाहती है। इस चर्चा के साथ ही ये संभावना जताई जाने लगी कि हो सकता है भाजपा उन्हें विदिशा से मैदान में उतारे! क्योंकि, यहाँ की सांसद सुषमा स्वराज ने अगला चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया है। लेकिन, अभी पार्टी ने पूरे पत्ते नहीं खोले हैं कि उन्हें कहाँ से और किसके खिलाफ चुनाव लड़ाया जाएगा! लेकिन, उड़ती-उड़ती ख़बरें बताती है कि उन्हें छिंदवाड़ा भेजा जा सकता है, जहाँ से इस बार कमलनाथ अपने बेटे नकुल को चुनाव लड़वाना चाहते हैं। भाजपा के लिए गुना और छिंदवाड़ा यही दो सीटें हैं, जो बरसों से उसके लिए चुनौती बनी हुई हैं। इस सारे घटनाक्रम और पार्टी के रवैये से यही निष्कर्ष निकलता है कि शिवराजसिंह के लिए आगे की राह आसान नहीं है! पार्टी उन्हें मध्यप्रदेश की राजनीति में उतना फ्री-हैंड देना नहीं चाहती, जितना वे पाने की कोशिश में हैं! यानी मुश्किलों की राह अभी आसान नहीं हुई, बल्कि बढ़ती जा रही है।
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(लेखक ‘सुबह सवेरे’ इंदौर के स्थानीय संपादक हैं)
संपर्क : 9755499919       
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