इसलिए गणेश को कहा जाता है वक्रतुण्ड

0
244

भगवान श्री गणेश का वक्रतुण्ड अवतार बह्रम रूप् से संपूर्ण शरीरों को धारण करने वाला मत्सरासुर का वध करने वाला तथा सिंह वाहन पर चलने वाला हैं।

मुद्रग्लपुराण के अनुसार भगवान श्रीगणेश के अनेक अवतार है जिनमें आठ अवतार प्रमुख हैं पहला अवतार वक्रतुण्ड का है। ऐसी कथा है कि देवराज इंन्द्र के प्रमाद से मत्सरासुर का जन्म हुआ उनके दैत्य गुरू शुक्राचार्य से भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र ओम नम शिवाय की दीक्षा प्राप्त कर भगवान शंकर की कठोर तपस्या की और भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर उसे अभय वरदान दिया । वरदान प्राप्त कर जब मत्सरासुर घर लौटा तो गुरू शुक्राचार्य ने उसे दैत्यों का राजा बना दिया और दैत्यमंत्रियों की सलाह पर मत्सरासुर ने संपूर्ण पृथ्वी पर राजाओं को हरा कर अपना शासन स्थापित कर लिया । पृथ्वी के बाद उसने पाताल और र्स्वग पर चढाई करी।वरूण कुबेर यम सहित सभी देवता पराजित होकर ब्रम्हा और विष्णु को साथ लेकर कैलास पर्वत पहुचें । मत्सासुर ने कैलास पर भी आक्रमण कर दिया और त्रिपुरारी भगवान शिव को भी पाश में बांध कर वहा भी शासन करने लगा।
दुखी देवताओं के सामने भगवान दतात्रेय ने वक्रतुण्ड के एकाक्षरी मंत्र गं का उपदेश देते हुए इसका जाप करने को कहा देवताओं के जाप से प्रसन्न होकर भगवान वक्रतुण्ड प्रकट हुए और उन्होंने अपने असंख्य गणों के साथ मत्सरासुर पर हमला बोल दिया पांच दिनों तक चले युद्ध में महिसासुर के दो पुत्र सुन्दरप्रिय और विषयप्रिय मारे गए और अंत में व्याकुल मत्सरासुर को भगवान वक्रतुण्ड ने कहा यदि तुझे प्राण प्रिय है तो मेरी शरण में आ जा । भगवान का सिंहवाहन पर विकराल रूप देख कर मत्सरासुर डर के मारे उनकी शरण में आ गया और उसे भगवान ने पाताल भेज कर अभय दान दे दिया ।तभी से प्रभु श्रीगणेश के इस अवतार को वक्रतुण्ड कहा जाने लगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here