‘कबीर सिंह’ का ये गंदा चेहरा भी तो देखिए! …..रील रिपोर्ट में एकता शर्मा

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हमारे यहाँ फिल्मों में महिला किरदारों के साथ दुर्व्यवहार और हिंसात्मक दृश्यों का मुद्दा अकसर उठता रहा है। कई बार ये बात भी सामने आई जिसमें कहा गया कि महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध में कहीं न कहीं फिल्मों की भूमिका है! वास्तव में ‘कबीर सिंह’ जैसी फ़िल्में ही इस तरह की बुराई को बढ़ावा देती हैं। ये फिल्म बिजनेस के नजरिए से सुपरहिट हुई है! लेकिन, इस फिल्म के बहाने ये मुद्दा एक बार फिर उठा है! कई महिला संगठनों और जागरूक महिलाओं ने इस बात को उठाया कि फिल्मों में महिला किरदारों को दोयम दर्जे का क्यों रचा जाता है? सिरफिरा नायक नशा करने के बाद अपनी हरकतों को सबसे ज्यादा नायिका पर ही क्यों आजमाता है? ‘कबीर सिंह’ का नायक भी फिल्म की नायिका को अपनी जागीर समझकर उस पर अपनी इच्छाएं लादता है और अपनी मर्दानगी दिखाता है! जिसकी जरुरत नहीं थी!
फिल्मों में महिलाओं के खिलाफ हिंसा से बचकर ही समाज में महिलाओं की स्थिति में सुधार किया जा सकता है। जिस तरह से फिल्म में महिलाओं से जुड़े दृश्य दिखाए जाते हैं, इसका लोगों पर असर होता है। क्योंकि, सामान्य जीवन में भी महिलाओं को ऐसी घटनाओं से गुजरना पड़ता है। ऐसी स्थिति सामने नहीं आए, इसके लिए जरूरी है कि फिल्मों में ऐसे दृश्यों से बचा जाए। फिल्मों के कलाकारों को भी इस मामले में समझने की जरुरत है। महिला विरोधी फ़िल्मी दृश्यों से महिलाओं पर अत्याचार बढ़े हैं। दर्शक फिल्म खुद भी वैसा ही करने की कोशिश करते हैं। इसलिए कि हमारे समाज में फिल्म बेहद सशक्त माध्यम है, ऐसे में इसका बेहद गंभीरता से इस्तेमाल होना चाहिए। जिससे लोगों में अच्छा संदेश जाए। जो लेखक और गीतकार डायलॉग या गीत लिखते हैं, उन्हें सबसे पहले अपनी परिवार की महिलाओं के बारे में सोचना चाहिए। निश्चित रूप से यदि वे एक बार सोच लेंगे तो उनका शब्दों का चयन सुधर जाएगा। फिल्मों के साथ-साथ टीवी पर आने वाले सीरियल और विज्ञापन भी काफी असर डालते हैं।  इनका सही इस्तेमाल बेहद जरूरी है। फिल्म के डायलॉग, गाने सभी का अपना असर होता है। लोगों में कहीं इनका गलत असर नहीं जाए इससे बचने के लिए जरूरी है कि फिल्मकार इसको लेकर गंभीर बने। इसमें सुधार के जरिए महिलाओं के खिलाफ हिंसा को कम किया जा सकता है।
कुछ दिनों पहले एक टीवी चैनल पर चर्चा चल रही थी कि ‘ग्रेंड मस्ती’ फिल्म समाज को दिखाने योग्य है या नहीं? यह विचार भी सामने आया कि इससे युवा मन गलत दिशा की तरफ आकर्षित होगा! उसी तरफ दौड़ेगा, गिरेगा और अपराध भी करेगा! तर्क यह भी दिया गया था कि क्या महिला का नग्न शरीर मनोरंजन का आधार बन सकता है? अधिकतर लोगों का मत था कि ऐसी फिल्में और महिलाओं के सम्मान के साथ ऐसा घिनौना व्यवहार कभी भी सहा नहीं जा सकता! लेकिन, एक फिल्म समीक्षक ने सभी सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ने की वकालत कर दी। उनका कुतर्क था कि फिल्म वयस्कों के लिए है, जो देखना चाहे वही देखे! दर्शक ऐसी फ़िल्में पसंद करते हैं। किसी के सिर पर बंदूक रखकर उसे जबरन फिल्म नहीं दिखाई जा रही। उनका तो यह भी कहना था कि आज सेंसर बोर्ड की जरूरत नहीं है! विदेशों में भी फिल्म सेंसर को ही नकारा जा रहा है। जब इंटरनेट पर ये आसानी से मिलता है, तो फिर ‘ग्रेंड मस्ती’ जैसी फिल्मों को दिखाने में कोई हर्ज नहीं। लेकिन, ऐसे तर्क देने वाले भूल जाते है कि महिलाओं के सम्मान के जो मापदंड भारत में है, वह पश्चिम में नहीं है। जिस देश में यह कह दिया जाए कि मनोरंजन के लिए सबकुछ ठीक है! जो बिकेगा, वही दिखेगा, जनता जो देखना चाहती है वही कलाकार दिखाएगा! तो फिर गली-गली नशाखोर और महिला उत्पीड़न करने वाले ‘कबीर सिंह’ पैदा होंगे, उनका क्या करोगे? इसका जवाब है किसी के पास?
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(लेखिका फिल्म समीक्षक हैं और फिल्म इतिहास के शोध कार्य से सम्बद्ध रही हैं)
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