कहीं हेट्रिक बनी तो कोई बनाने को बेताब: तीसरी बार नही लौटी पार्टी

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16_11_2012-15loksabhaelec1लोकल इन्दौर17 नवम्बर। इन्दौर शहर की छह सीटों में से पांच पर भाजपा और कांग्रेस के बीच कडा मुकाबला है तो एक सीट पर कांग्रेस के बागी के खडे होने की वजह से त्रिकोणीय स्थित पैदा हो गई है. वर्तमान में भाजपा शहर की पांच सीटों पर कब्जा जमाये हुए है तो कांग्रेस के पास एक ही सीट है. लेकिन इस बार कांग्रेस को उम्मीद है कि वह शहर की दो और सीटों पर कब्जा कर सकती है. वही भाजपा कांग्रेस कब्जे की सीट भी अपने खाते में करने के लिए लालयित है.शहर की इन छह विधानसभाओं के इतिहास पर लोकल इंदौर ने विश्लेषण ​किया तो पाय कि वह भी बडा रोचक रहा है. कुछ सीटो में कभी भाजपा जीत कर आई तो कभी कांग्रेस के खाते में रही. लेकिन ऐसी दो सीटे है जिनपर कभी कांग्रेस और वामदल का कब्जा हुआ करता था. वह पूरी तरह से भाजपा मय हो गई है और लगातार इस इन सीटों पर भाजपा के उम्मीदवार बडी लीड से जीत हासिल करते आ रहे है. 1985 से लेकर 2008 तक हुए चुनाव की एक समीक्षा यह प्रस्तुत हैः
विधानसभा- तीसरी बार नही्ं जीती पार्टी
कांग्रेस के कब्जे वाले इस सीट पर पहली बार 1993 में भाजपा को जीत का स्वाद चखने को मिला. भाजपा के उम्मीदवार लालचन्द मित्तल ने दो बार से लगातार जीतकर आ रहे कांग्रेस उम्मीदवार ललित जैन को 8360 मतो से शिकस्त दी. लेकिन भाजपा 1998 के चुनाव में फिर से इस सीट को गँवा बैठी. कांग्रेस के रामलाल यादव ने लालचन्द मित्तल को 5440 मतों से हार कर यह सीट फिर से कांग्रेस के खाते में दर्ज कर दी. 2003 में यह सीट फिर से कांग्रेस के हाथों से फिसल कर भाजपा के पास आ गई और इस बार भाजपा उम्मीदवार सुश्री उषा ठाकुर ने कांग्रेस उम्मीदवार रामलाल यादव को करारी शिकस्त दी. भाजपा ने यह सीट 27460 मतों के अंतर से जीत ली. यह जीत इस क्षेत्र में हुए चुनाव में सबसे बडी जीत थी. इतने मतों के अंतर से कभी इस क्षेत्र में कोई दुसरा उम्मीदवार नहीं जीता. इस जीत को भाजपा ने बरकरार रखा लेकिन 2008 के चुनाव में उम्मीदवार बदल दिया. सुश्री उषा ठाकुर की जगह भाजपा ने उस वक्त के तत्कालिन नगर अध्यक्ष सुर्दशन गुप्ता को मैदान में उतरा. गुप्ता की उम्मीदवारी को लेकर भाजपा में जमाकर हंगामा हुआ और उस वक्त की वर्तमान विधायक ठाकुर ने निर्दलिय चुनाव लडने की घोषणा कर दी. ले देके भाजपा के बडे नेताओं ने उन्हें मनाया. जिस सीट को भाजपा ने 27 हजार के विशाल अंतर से जीता था. वही सीट भाजपा सिर्फ 8183 मतों से जीत सकी.
इस बार इस सीट पर त्रिकोणीय मुकबला है. शुरु शुरु में भाजपा के वर्तमान विधायक सुदर्शन गुप्ता के खिलाफ विरोध का महौल था.जिसे संगठन स्तर पर पार्टी के नेताओं ने शांत कर दिया. वही कांग्रेस में इस सीट से चार चार दावेदार होने की वजह से विरोध का महौल बन गया. फिलहाल भाजपा इस सीट पर राहत की सांस ले रही है. वही कांग्रेस को बागी के साथ साथ अपने दुसरे नेताओं को भी साधना पड रहा है.
विधानसभा-दों भजपा का किला बन गई
यह सीट भाजपा की प्रदेश में सबसे सुरक्षित मानी जानी वाली सीटों में से एक है. पिछले दो दशकों में हुए चार चुनावों में इस सीट पर भाजपा लम्बें अंतरों से जीत हासिल करती रही है.यह सीट 1985 और उससे पहले कांग्रेस और सीपीआई के खातें में ही जाती थी. क्योंकि इस क्षेत्र में कपडा मिले थी और ट्रेड यूनियनों का बोलबाल था. 1993 में पहली बार भाजपा को इस सीट से जीत नसीब हुई. कैलाश विजयवर्गीय ने कांग्रेसी नेता कृपाशंकर शुक्ला को 21062 के बडे अंतर से हराकर इस सीट को भाजपा की झोली में डाल दिया.2003 तक इस सीट का प्रतिनिधित्व कैलाश विजयवर्गीय ने किया और जब 2008 के चुनाव में भाजपा ने उन्हें महू भेजा तो इस सीट से उनके खास मित्र रमेश मेन्दोला को टिकट दिया. मेन्दोला भी पार्टी के के विश्वास में खरे उतरे और 39937 मतों के विशाल बढत के साथ जीत दर्ज की. भाजपा के किले के रुप में जाने जानेवाली इस सीट को कांग्रेसी 1990 के बाद से भेद नहीं पायें. .
विधानसभा-तीन कांग्रेस हेट्रिक बना चुकी
1990-93 की जीत के बाद से यह सीट भाजपा के लिए स्वप्न बन गई है.1998 से इस सीट पर कांग्रेस के अश्विन जोशी जीतते चले आ रहे है. सामजिक समीकरणों का इस सीट पर तानाबाना ऐसा उलझा हुआ है कि यदि एक वर्ग का मत कांग्रेस की तरफ चल जाये तो भाजपा को नुकसान उठना पडता है. हॉलकि यह सीट कांग्रेस के लिए भी उतनी आसान नहीं है.हर बार कांग्रेस को भाजपा से कडी टक्कर मिली है. 1985 से 2008 तक हुए चुनाव के आंकडे देखें तो कांग्रेस और भाजपा की जीत में कोई बडा फर्क नहीं रहा है.1985 में कांग्रेस के महेश जोशी ने भाजपा की सुमित्रा महाजन को 5103 मतों से हराया. ठीक इसके बाद हुए 1990 के चुनाव में जोशी को भाजपा के गोपीकृष्ण नेमा से शिकस्त खानी पडी. भाजपा ने 4193 मतों के अंतर से यह सीट अपने कब्जे में कर ली. 1993 के चुनाव भी भाजपा के खाते में गया. नेमा ने लगातार दुसरी बार जीत हासिल करते हुए कांग्रेस के उम्मीदवार अनवर खान को बडी 9714 मतों से हराया. किंतु वे हेट्रिक नहीं बना सके. 1998 के चुनाव में कांग्रेस के अश्विन जोशी ने नेमा को 3130 मतों से हराकर यह सीट फिर से कांग्रेस की झोली में डाल दी. 2003 के चुनाव में एक बार फिर कांग्रेस ने जोशी पर विश्वास किया. इस बार भी जोशी ने भाजपा के उम्मीदवार गोपीकृष्न नेमा को 4962 मतो से हराया. 2008 का चुनाव भी जोशी और नेमा के बीच ही हुआ लेकिन इस बार जोशी बमुश्किल 402 मतों से ही जीत सके.तीन बार से लगातार जीतते आ रही इस सीट पर कांग्रेस की राह आसान नहीं है.
विधानसभा-चार
भाजपा की अयोध्या कहने जाने वाली इन्दौर शहर की यह सीट कांग्रेस के लिए एक बडी चुनौती है. 1990 से कांग्रेस इस सीट से हर बार बडे अंतरों से शिकस्त खाते आ रही है. इस सीट पर भी सामाजिक समीकरणों का ताना बाना उलझा हुआ है.,सिन्धी और मुसलामानों वोटों से ही इस क्षेत्र के विधायक का फैसला होता है.वैसे इस सीट पर मुद्दों से ज्यादा अहिमियत मतों के ध्रुवीकरण का है. अभी तक भाजपा इसी ध्रवीकरण की वजह से यह से जीत हासिल करती रही है. 1990 में भाजपा ने इस सीट से प्रदेश के कद्दावर नेता के रुप में पहचाने जाने वाले मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को मैदान में उतरा था. उसके बाद लक्ष्मण सिंह गौड और उनके निधन के बाद उनकी पत्नी का कब्जा है।

विधानसभा-पांच हर्डिया की हेट्रिक ……?

यह सीट पर कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा का कब्जा रहा.एक बार इस सीट से 1985 में कांग्रेस के नेता सुरेश सेठ निर्दलीय उम्मीदवार के रुप में चुनाव जीत चूके है.इस सीट पर पहली बार 1993 में भाजपा को प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला. सहकारिता नेता के रुप में जाने जाने वाले भँवर सिंह शेखावत को पार्टी ने मैदान में उतरा. शेखावत ने उस वक्त के विधायक और कांग्रेसी नेता अशोक शुक्ला को 13162 मतों से हरा कर यह सीट हासिल की थी. लेकिन ठीक इसके बाद 1998 के चुनाव में यह सीट भाजपा के हाथों से निकल गई. इस चुनाव में कांग्रेस की तरफ से सत्यनारायण पटेल मैदान में थे तो भाजपा की तरफ से शेखावत. पटेल ने 10835 मतों से शेखावत को हराकर इस सीट पर कब्जा कर लिया. 2003 के चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस को 22998 मतों के अंतर से शिकस्त देते हुए इस सीट को पुनः अपने कब्जे में कर लिया. 2008 के चुनाव में एक बार फिर भाजपा के महेन्द्र हार्डिया ने जीत हासिल की लेकिन इस जीत का अंतर घटकर महज 5264 मतों का रहा.
इस बार मैदान में भाजपा की तरफ से महेन्द्र हार्डिया है तो दुसरी तरफ से कांग्रेस उम्मीदवार के रुप में पकंज संघवी. टक्कर कडी है. भाजपा जहाँ जीत की हैट्रिक बनाने के लिए प्रयासरत है तो कांग्रेस इस सीट को अपने खाते में करने के लिए बेकरार है.

विधानसभा-राऊ

2008 के परिसीमन के बाद बनी राऊ विधानसभा भाजपा के खातें में है. इस सीट पर पिछला चुनाव उसी एक ही गाँव के रहने वाले दोस्त कांग्रेस की तरफ से जीतू पटवारी और भाजपा की तरफ से जीतु जिराती ने लडा था. इस चुनाव में जीतु जिराती ने कडे संघर्ष में कांग्रेस के जीतु पतवारी को 3843 मतों से हराकर पहले विधायक बनने का गौरव हासिल किया. इसी के साथ भाजपा के खाते में यह सीट आ गई. इस बार भी दोनो ही आमने सामने है।

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