कांग्रेस तथा भाजपा के लोगों के बहुत फोन आये – अमृता

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amritaलोकल इंदौर। आत्म सम्मान की लड़ाई में पुलिस की नौकरी से त्याग पत्र देकर सुर्खियों में आई उप निरीक्षक अमृतासिंह सोलंकी का  मलावर थाना प्रभारी रहते हुए अपने पद से कंडीशनल दिया गया त्याग पत्र पुलिस विभाग की गले की हड्डी बन गया है। वर्ष2007 से पुलिस विभाग मे भर्ती हुई अमृता  छात्र जीवन के दौरान इंदौर में अखिलभारतीय विद्यार्थी परिषद की संगठन मंत्री भी रहीं है। तीन वर्षों में अमृतासिंह ने दस ट्रांसफर सहित कई उतार देखे हैं। इंदौर प्रवास के दौरान हमारे संवाददाता से खास मुलाकात में अमृतासिंह ने कहा अब मेरा नौकरी करने का मन नहीं है।

प्रश्नः- पुलिस विभाग की नौकरी में आपके क्या अनुभव रहे हैं।

अमृतासिंहः- पुलिस विभाग अच्छा विभाग है यह एक ऐसा विभाग है जहां हम जनता से सीधे जुड़ते हैं।

प्रश्नः- ऐसा क्या था कि आपको अपना त्याग पत्र ही देना पड़ा

उत्तरः- मैने त्याग पत्र इसलिए दिया क्योंकि सिस्टम में रहते हुए मैं ना तो अपनी पीड़ा व्यक्त कर पाती और ना ही खुल कर बोल पाती। अनुशासन के कारण मुझे कई कार्यवाही करने से पहले विभाग से बार-बार अनुमति लेना पड़ती जो शायद मुझे नहीं मिल पाती। मामला ही कुछ ऐसा था कि मेरे द्वारा सही कार्यवाही करने के बावजूद मुझे ही दंडित होना पड़ा। मुझे याद है घटना की रात जब मैं पगारी बंगला पांइट एनएच 12 पर रूटीन चेकिंग पर थी। रात्री लगभग 12:30 बजे एक बंद लाल बत्ती लगी हुई गाड़ी हमारे चेक पाइंट के पास से गुजर रही थी तभी आरक्षक ने हाथ देकर गाड़ी को रोका। बत्ती वाले वाहन का लाईट तेज होने से उसके कांच पर क्या लिखा है यह दिखाई नहीं दिया। मैने वाहन के पास पहुंचकर पूछताछ की तो उसमें बैठे चुनाव प्रेक्षक गया प्रसाद ने कहा अंधी है क्या दिखाई नहीं देता सामने कांच पर प्रेक्षक लिखा है। मैने माफी मांगते हुए कहा कि वाहन के लाइट तेज होने के कारण मुझे दिखाई नहीं दिया। उन्होंने कहा तुम्हे किसने कहा है मेरा वाहन रोकने के लिए मैने कहा एसडीओपी साहब के निर्देश पर रूटिन चेकिंग है। उन्होने नाराज होते हुए कहा एसडोओपी हमसे बड़ा है क्या जो हमारी गाड़ी रुकवाएगा। फटकार लगाते हुए मेरा नाम पूछा और कहा तुम नालायक हो, इस नौकरी को डिसर्व नहीं करती हो पैसे देकर भर्ती हुई हो क्या। उन्होंने वहीं से हमारे एसपी श्री सुशांत सक्सेना को फोन किया और अगले दिन सुबह मुझे लाईन अटैच कर दिया गया। मैने पुलिस अधीक्षक के सामने उपस्थित होकर अपना पक्ष रखा। जब मुझे न्याय नहीं मिला तो मैने 26  नवंबर को एक माह के वेतन का चेक अटैच कर त्याग पत्र दे दिया।

प्रश्नः- आप अभाविप की नेत्री रहीं है ऐसी स्थिति में इस कदम पर सरकार से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहयोग नहीं मिला ?

उत्तरः- मेरे पास कांग्रेस तथा भाजपा के लोगों के फोन आए थे। तब मैने कहा मुझे सड़क से समर्थन नहीं चाहिए अगर आप मेरी मदद ही करना चाहते हैं तो पुलिस रेग्यूलेशन एक्ट में बदलाव कर पूरे पुलिस महकमे को मदद करें।

प्रश्नः- यदि आपका त्यागपत्र स्वीकृत हो जाता है ऐसी दशा में आप क्या करेंगी।

उत्तरः- मैने अपना त्याग पत्र स्वीकृत होने के लिए ही दिया है। मैंने एलएलबी किया है। सबसे पहले मैं सनद के लिए प्रयास करूंगी ताकि विभाग से परेशान लोगों को न्याय दिला सकूं। मैं निमाड़ क्षेत्र की रहने वाली हूं यह पूरा क्षेत्र जनजातीय क्षेत्र है। मैं इस क्षेत्र में केरियर कांउसिलिंग के निःशुल्क शिविर लगवाउंगी तथा कक्षा दसवीं के बाद बच्चों को कैसी पढाई करनी चाहिए जिससे की वे अधिक से अधिक संख्या में लोक सेवाओं में पहुंच सके। मुझे दुख होता है देख कर आजादी के 66 वर्षों के बाद भी इस क्षेत्र में सही गाईडेंस और जागृती की कमी है।

प्रश्नः- आपको क्या लगता है सरकार से लड़कर जीता जा सकता है।

उत्तरः- मेरी लड़ाई सरकार या विभाग से नहीं है मैं यह चाहती हूं कि कोई निष्ठा से नौकरी कर रहा है तो उस पर चौतरफा वैसे ही दबाव रहता है। फिर आप विभाग मैं बैठ कर ही किसी भी शिकायत पर कुछ भी कार्यवाही कर देंगे..? यह कानूनन भी गलत है और नैतिकता पर भी गलत है।

प्रश्नः- आप प्रदेश की महिलाओं को क्या संदेश देना चाहती हैं।

उत्तरः- सहनशीलता महिलाओं का स्वभाव होता है। लेकिन सहनशीलता का अक्सर दुरूपयोग होता है। अगर किसी महिला के साथ असहनीय व्यवहार होता है तो उसे खुलकर सामने आना चाहिए।

 

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