कामासुर संहारक है भगवान श्री गणेश का विकट अवतार

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 भगवान श्री गणेश का विकट नामक अवतार कामासुर का संहारक है वे सौरग्रम्ह का धारक और मयूर की सवारी करने वाले हैं।

भगवान विष्णु जब जालन्धर वध करने हेतु वृन्दा का तप नष्ट करने गए थे ।उसी समय उनके शुक्र से अत्यन्त तेजस्वी कामासुर पैदा हो गया था ।
उनके दैत्य गुरू शुक्राचार्य से भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र ओम नम शिवाय की दीक्षा प्राप्त कर भगवान शंकर की कठोर तपस्या की और भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर उसे वरदान मॉंगने को कहा । उसने कहा —प्रभो ! आप मुझे ब्रह्माण्ड का राज्य और अपनी भक्ति प्रदान करें । मैं बलवान ,निर्भय और मृत्यु जीवी होउं।शिवजी ने उसे वरदान दे दिया ।
वरदान प्राप्त कर जब मत्सरासुर घर लौटा तो गुरू शुक्राचार्य ने उसे दैत्यों का राजा बना दिया और मर्हिषासुर की पुत्री तृष्णा के साथ उसका विवाह कर दिया । कामासुर ने रतिद नगर में अपनी राजधानी बनाई और रावण, शम्बर, महिश,ब​लि आदि को अपना सेनाप्रधान बनायां।उसने तीनो लोको पृथ्वी पाताल और र्स्वग पर अपना शासन स्थापित कर लिया ।
महर्षि मुद्गल की प्रेरणा से समस्त देवताओ ने मयरेश क्षेत्र में पहुंचे और उन्होनें वहॉं भगवान गणेश की आराधना की । भगवान ने विकट रूप में प्रगट हो कर देवताओं को कमासुर से मुक्ति दिलाने का आश्वासन दिया ।
मयूर वाहन पर विकट ने सेना के साथ कामासुर के नगर को घेर लिया और भयानक युद्ध होने लगा । उसके दो पुत्र शोषण ओर दुष्पूर मारे गए। भगवान विकट ने उससे कहा कि तूने भगवान शिव से प्राप्त वरदान के प्रभाव से अधर्म किया है । यदि अपना जीवन चाहता है तो मेरी शरण में आ जा। कामासुर ने भगवान विकट पर अपनी गदा फैंकी लेकिन वह उन्हें छुए बिना धरती पर आ गिरी । विकट के प्रहार से कामासुर मूर्छित हो कर गिर पडा और अन्त में वह प्रभु की शरण में आ गया ।

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