क्या ये मोदी की तीसरी शिकस्त से बचने की शुरुआत है

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आगामी दिनों में उत्तर प्रदेश में   होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी दलितों के मसीहा डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को अपनाने जा रही है या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत भारत के आरक्षण में बदलाव संबंधी बयान को अपनाने की कोशिश कर रही है ?
ये दोनों  ही सवाल अलग-अलग नहीं बल्कि एक दूसरे से इतने गुत्थम-गुत्था है कि इन्हें अलग करना असंभव भी दिखाई दे रहा है ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबका साथ सबका विकास का जो नारा लोकसभा चुनाव में दिया था उसे अपने कार्यकाल के 2 वर्ष पूर्ण होने पर एक नई दिशा देने की कोशिश में देश के दलितों को साथ लेने की यह मुहिम कितनी कारगर साबित होगी यह तो आने वाले वक्त के गर्त में ही छुपा है ,लेकिन भारतीय जनता पार्टी जिस तरह से डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को अपनाने की जुगत कर रही है उससे मायावती सहित कई राजनीतिक नेताओ और दलों के कान खड़े होना लाजमी है। निश्चित ही आगामी उत्तर प्रदेश के चुनाव में दलित वोटों की एक अलग ही राजनीति है जिसका अपना एक अलग प्रभाव है ।
मोदी के प्रधानमंत्री पद पर रहते जिस तरह से दिल्ली और बिहार में विधान सभा का चुनाव बीजेपी ने लड़ा और शिकस्त खाई उसके बाद भारतीय जनता पार्टी किसी और राज्य में शिकस्त खाने के मूड में नहीं है। यही कारण  है कि बंगाल के उपचुनाव को परे रख  कर पार्टी उत्तरप्रदेश में अपनी जड़ें मजबूत करने में लगी है और इसके लिए डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को वह अपना कर ,दलित वोट बैंकों पर निशाना साध रही है। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह सरकार के तीसरे कार्यकाल में बीजेपी की  आंतरिक स्थिति जो भी हो लेकिन वह इसी जमीन से उत्तरप्रदेश में अपने आशियाने की  नीव रखने की कोशिश में जुट गई है निश्चित ही शिवराज सिंह नरेंद्र मोदी की तरह ही एक ही राज्य में लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बने हैं मगर वह मोदी के समकक्ष ही है और यदि बाबा साहेब की जन्म स्थली से शुरू हुवा यह अभियान उत्तर प्रदेश के चुनाव में पार्टी को सरकार बनाने का अवसर प्रदान करती है तो यह शिवराज सिंह की उपलब्धियों के खाते में भी जाएगा ।संघ की निगाह में शिवराज सिंह भी उतने ही महत्वपूर्ण है जितने की नरेंद्र मोदी ।
सवाल यह उठता है कि मोदी के विकास के नारे का साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हिंदुत्व के नारा कितना दे पाएगा यह भी देखना जरूरी है देश में आज 20% वोट दलितों के हैं और हर राजनीतिक दल इन वोटों को अपनी जेब में रखने के लिए हर मुमकिन कोशिश करने से नहीं चुकेगा। सत्ता में बैठी भाजपा इंडिया शाइनिंग और फील गुड जैसे नारों के साथ अच्छे दिनों की कल्पना में दलितों को कितना अपनाती है यह वक्त ही बताएगाऔर अब इसकी शुरुआत हो चुकी है

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