जादुगर आनन्द बोले ..नेता और हम भाई ..हम दृष्टिभ्रम करते है वे मति भ्रम

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लोकल इंदौर २४ अप्रैल .( कीर्ती राणा )कभी रजनीश (ओशो) के साथ रहते हुए उनसे सम्मोहन सीखने वाले और स्वामी आनंद परमहंस ही जादूगर आनंद हैं, जानकर आश्चर्य हो सकता है पर यह हक़ीक़त है। वे शहर में 29 अप्रैल से जादू के करिश्मे दिखाने आ रहे हैं। उन्होंने यह तो नहीं माना कि राजनेता उनसे बड़े जादूगर है, यह ज़रूर कहा कि हम दोनों तो  भाई हैं।देखने वालों के सामने हम दृष्टि भ्रम पैदा करते है और नेता उनकी मति भ्रम करता है।                                      जबलपुर में जन्में, इंदौर से कॉलेज एजुकेशन कर चुके 68 वर्षीय आनंद अवस्थी जादू की दुनिया का इसलिए जाना पहचाना नाम है कि चार बार विश्व कीर्तिमान उनके नाम है। एशिया के 16 हजार जादूगरों का जो महासंघ  है वो उसके लगातार 18 वर्षों से अध्यक्ष है।                                                                                                इतनी शोहरत के बाद भी उनके मन में यह बात खटकती रहती है कि जिस जादू के बल पर वे न सिर्फ मप्र वरन देश के सांस्कृतिक राजदूत की भूमिका भी निभा रहे हैं सरकारें इस कला की गंभीरता को हंस कर टाल देती है। इसी रवैये के कारण मप्र में मैजिक एकेडमी की स्थापना का सपना पूरा नहीं हो पा रहा है, सरकार की कोई रुचि ही नहीं है। जादू को पाठ्यक्रम में शामिल करने से पहले ज़रूरी है एकेडमी की स्थापना लेकिन 1947 से लेकर आज तक किसी सरकार ने पहल नहीं की। नामी जादूगर प्रो राणा अपने अंतिम दिनों में भूख से मर गए, यह हश्र है इस कला का। सर्कस हमारी संस्कृति की विरासत नहीं हो सकता। हमारी संस्कृति है इंद्रजाल और काले जादू वाली, हांलाकि काले जादू के नकारात्मक पक्ष के कारण वे इसे मनोरंजन वाला नहीं मानते हैं।

जादू के प्रति आकर्षण कैसे जगा? आनंद कहते हैं बचपन में सड़क-चौराहे पर जादू देखता था। वो लोग जाने कैसे हाथों में लड्डू और जलेबी ले आते थे। बच्चा होने के कारण भीड़ में आगे रहता था, अकसर लड्डू मुझे खाने को मिल जाते। बस सोच लिया कि अपन ही जादू सीख लो, चाहे जब लड्डू खा सकेंगे और इस तरह मेरी हॉबी ही मेरा प्रोफेशन बन गई। सत्यसांई बाबा के चमत्कारों को चुनौती देने के लिए तब

ओशो (रजनीश) ने मुझे तैयार किया, सम्मोहन सिखाया
उस वक्त देश में चमत्कारों के कारण सत्य सांई बाबा का ख़ूब आकर्षण था।रजनीश कहते थे साई बाबा जादुई ट्रिक करते हैं। रजनीश मुझे सम्मोहन सिखाते थे। एक दिन प्लानिंग की कि सत्य साई बाबा को आमने-सामने मुक़ाबले की चुनौती देते हैं।मैं उनके आश्रम में ही रहता था, मेरा नामकरण स्वामी आनंद परमहंस कर दिया था। मैंने ओशो( तब भगवान रजनीश) की इस प्लानिंग के तहत मुक़ाबला करने की सहमति दे दी लेकिन साफ़ कह दिया बाक़ी चेलों जैसा ये लबादा नहीं पहनूँगा। मेरे लिए भगवा कपड़े के सफ़ारी सूट तैयार कराए, 7-8 विदेशी लड़कियाँ मेरी सहायक के रूप में थी। बाँबे के  होटल ताज में जाना बचपन से मेरा सपना था, इसी होटल में सांई बाबा के चमत्कारों को चुनौती देने वाली प्रेस कांफ्रेंस हुई, ख़ूब प्रचार मिला पर बाबा ने तवज्जो नहीं दी।

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