दोनों तरफ से नए सेनापति लड़ेंगे मध्यप्रदेश का अगला चुनाव …सौ टंच में हेमंत पाल

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  मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव की रणनीति के लिए शतरंज के मोहरे नए सिरे से जमाए जाने की तैयारी है। जिस तरह सजाए जाने की रणनीति बनाई जा रही है, ये चौंकाने वाली बात होगी! अभी योजना शुरुवाती दौर में है। लेकिन, राजनीतिक स्थितियां इस बात की गवाही दे रही है कि दोनों पार्टियों के योजनाकार मध्यप्रदेश के चुनाव को हल्के में नहीं ले रहे! भाजपा संगठन और आरएसएस के बीच सहमति बनी तो उत्तरप्रदेश की तरह यहाँ भी दो उप मुख्यमंत्रियों की कुर्सियां सज सकती हैं। कुछ इसी तरह की योजना कांग्रेस में भी बनती नजर आ रही है। प्रदेश भाजपा की कमान संघ की पसंद के किसी और नेता को दी जा सकती है। उधर, प्रदेश कांग्रेस के नए अध्यक्ष के साथ दो कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने की भी तैयारी है! इसलिए कि चुनाव में गुटीय संतुलन बना रहे। कांग्रेस में आज जो सिर फुटव्वल हालात हैं, उसे देखते हुए उसकी अगले चुनाव में बड़ी जीत संदिग्ध ही है!
  पिछले दिनों हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने दो राज्यों उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में बाजी मारी। दो राज्यों मणिपुर और गोआ में वो जोड़तोड़ से सरकार बनाने में सफल हुई। कांग्रेस को सिर्फ पंजाब में सरकार बनाने का मौका मिला! लेकिन, इस चुनाव के नतीजों से निकल एक छुपा संदेश ये रहा कि सभी राज्यों में सत्ताधारी पार्टियां चुनाव हारी हैं। इन सभी राज्यों में एंटी-इनकंबेंसी इतनी ज्यादा थी कि वोटर्स ने सत्ताधारी पार्टी को हराने में जरा भी संकोच नहीं किया। भाजपा ने इस एवीएम से निकले इस संदेश को गंभीरता से समझा। इस घटना ने उसे सचेत भी कर दिया। भाजपा के दिल्ली में बैठे नेता मध्यप्रदेश को लेकर कोई रिस्क लेने के मूड में नहीं हैं। संघ को इस बात का आभास है कि सिर्फ पार्टी संगठन के भरोसे मध्यप्रदेश में चौथी बार सरकार बना पाना आसान नहीं है। संकेत मिल रहे हैं कि यदि समीकरण सही बैठे तो मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री के साथ दो उपमुख्यमंत्री नजर आ सकते हैं। ये कौन होंगे, ये अभी तय नहीं है।
  दो मुख्यमंत्री बनाने की संघ की रणनीति अचानक नहीं बनी! पिछले साल संघ ने मई में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के जरिए 20 बिंदुओं पर प्रदेश में ‘संवेदना-2016’ नाम से अराजनीतिक सर्वे करवाया था। इस सर्वे के नतीजों से संघ ने प्रदेश की राजनीति की नब्ज को भांप लिया! सर्वे में आरक्षण समेत कई मुद्दों को लेकर जनता का मन टटोला गया! इस सर्वे का निष्कर्ष कई मामलों में उम्मीद और दावों के विपरीत गया! विभिन्न मुद्दों पर राय लेने के बाद स्पष्ट हुआ था कि 2018 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश में भाजपा की सीटें 100 से नीचे आ सकती है। अभी 230 में से भाजपा के पास 165 सीटें हैं। संघ का सर्वे प्रदेश सरकार और संगठन दोनों के लिए खतरे का संकेत था। भाजपा में सतह पर भले शांति ही दिखाई दे रही हो, पर वास्तव में ऐसा नहीं है। अंदर ही अंदर असंतोष का लावा खदबदा रहा है।
   प्रदेश भाजपा में मची इस गुटबाजी को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नंदकुमारसिंह चौहान संभाल नहीं पा रहे हैं। ये बात कई बार साफ़ हो चुकी है। वे सत्ता से इतने ज्यादा अभिभूत हैं कि संगठन की अलग पहचान बना सके! यही कारण है कि चुनाव की तैयारियों के लिए नए अध्यक्ष पर विचार किया जाने लगा! भाजपा में मचे गुटीय संघर्ष से प्रदेश में नौकरशाही हावी हो गई। उन्होंने मुख्यमंत्री को इस तरह घेर लिया है कि वे प्रदेश की वास्तविकता से अनभिज्ञ हैं! नौकरशाहों ने उन्हें हरियाली का ऐसा चश्मा लगा दिया कि उन्हें वो बंजर दिखाई नहीं दे रहा!
  कुछ ऐसे ही हालात कांग्रेस में भी बन रहे हैं। तीन क्षत्रपों में बंटी पार्टी के कार्यकर्ता पार्टी के बजाए अपने नेता के प्रति ज्यादा वफादार हैं। ऐसी स्थिति में पार्टी की ‘मिशन 2018’ की तैयारियां कैसे शुरू होगी और क्या नतीजा सामने आएगा, कहा नहीं जा सकता! ऐसे में कांग्रेस हाईकमान पहला प्रयोग प्रदेश अध्यक्ष बदलकर करेगी। इसके लिए राजनीतिक माहौल बनने भी लगा। ये मानकर चला जा रहा है कि प्रदेश में मुखिया की जिम्मेदारी कमलनाथ को सौंपी जा सकती है। शक़ नहीं कि कमलनाथ इस दौड़ में सबसे आगे भी हैं! लेकिन, चुनाव की पूरी कमान उनके हाथ में होगी, ये दावा नहीं किया जा सकता! उनके साथ दो कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने की भी तैयारी है। ये दो कुर्सियां किसे दी जाएंगी, ये स्पष्ट है। एक पर ज्योतिरादित्य सिंधिया गुट का कोई नेता काबिज होगा, दूसरी पर दिग्विजय सिंह का! अध्यक्ष के साथ दो कार्यकारी अध्यक्ष बना दिए जाने से जहाँ अध्यक्ष की जिम्मेदारी बंट जाएगी, वहीं प्रदेश में पार्टी के तीनों नेताओं की साख भी दांव पर होगी! क्योंकि, कोई भी हार की स्थिति में ठीकरा दूसरे के सर पर नहीं फोड़ पाएगा। जब तीनों  नेता मोर्चे पर तैनात कर दिए जाएंगे तो कोई भी एक-दूसरे को निपटाने की राजनीति का खेल भी नहीं खेल पाएगा! लेकिन, अभी इस सबके लिए थोड़ा इंतजार कीजिए!
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(लेखक ‘सुबह सवेरे’ इंदौर के स्थानीय संपादक हैं)
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