प्रदेश में भाजपा के ‘ट्रबल-शूटर’ यानी नरेंद्र तोमर …मालवा मंत्रा में हेमंत पाल 

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 प्रदेश भाजपा में इन दिनों किसी का सिक्का सवा रुपए में चल रहा है तो वो हैं नरेंद्र तोमर! कार्यकर्ताओं को संगठन से जोड़कर रखने और नाराजी को ठंडा करने की उनमें अद्भुत राजनीतिक कला है। पार्टी को अच्छी तरह पता है, कि टिकटों की घोषणा के बाद पार्टी के अंदर एक असंतोष की लहर चलेगी। जिन विधायकों के टिकट कटेंगे या जिन्हें उम्मीद है उनको टिकट नहीं मिलेगा, वे अपना असंतोष अलग-अलग तरीके से व्यक्त करेंगे! पार्टी के लिए सबसे मुश्किल होगा, इस असंतोष को इतना ठंडा करना! क्योंकि, ये नाराजी पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों के लिए परेशानी का कारण बन सकती है। लेकिन, इस परेशानी को हल कर लेना आसान नहीं है, नरेंद्र तोमर के लिए मुश्किल भी नहीं! ये काम न तो मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के बस की बात है न प्रदेश संगठन मंत्री सुहास भगत के और न प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह ही ये कर सकते हैं। पार्टी ने भी तय कर लिया है कि टिकटों की घोषणा के बाद उभरने वाले संभावित असंतोष को ठंडा करने के लिए नरेंद्र तोमर को ट्रबल-शूटर की तरह सामने कर दिया जाएगा! दरअसल, ये नरेंद्र तोमर की काम करने की अपनी शैली ही है कि पार्टी के नेता हों या कार्यकर्ता उनके सामने ज्यादा देर नाराज नहीं रह पाते! उनकी ये समझाइश वाली स्टाइल बहुत कुछ कुशाभाऊ ठाकरे जैसी है, जो पूरे अधिकार से कार्यकर्ता को जो बोलते थे, वो उसे टाल नहीं पाता था। 2008 और 2013 के विधानसभा चुनाव में भी ऐसी स्थिति आई थी, जब टिकट कटने वालों नेताओं ने पार्टी संगठन के सामने अपना गुस्सा जाहिर किया था! लेकिन, इसका असर चुनाव में कहीं दिखाई नहीं दिया! उस वक़्त भी नरेंद्र तोमर ने जिससे जो वादा किया या आश्वासन दिया, उसे काफी हद तक पूरा किया। इस बार भी वही स्थिति निर्मित होना है। लेकिन, पार्टी को भरोसा है कि नरेंद्र तोमर है न, वे सब ठीक कर देंगे।
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अमित शाह के सामने ही फीका नजारा 
   भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने इंदौर से विधानसभा चुनाव के लिए महाजनसंपर्क अभियान शुरू तो किया, पर इसमें ‘महा’ जैसा कुछ नजर नहीं आया। राजबाड़े पर जहाँ से अमित शाह को अहिल्या माता की प्रतिमा पर माल्यार्पण के बाद दुकानदारों से संपर्क करते हुए छतरी तक जाना था, वो सारा प्लान फेल हो गया। क्योंकि, राष्ट्रीय अध्यक्ष की मौजूदगी बताने वाली भीड़ जो यहाँ नहीं थी। पूरे राजबाड़ा क्षेत्र में कार्यकर्ता कम और खाकी वर्दी ज्यादा नजर आ रही थी। ये इलाका विधानसभा के क्षेत्र क्रमांक-3 में आता है, जहाँ कि विधायक भाजपा की फायरब्रांड नेत्री उषा ठाकुर हैं, पर वे भीड़ तक नहीं जुटा सकीं। नगर अध्यक्ष गोपी नेमा ने भी इस मामले में उषा ठाकुर के सामने नाराजी व्यक्त की! दशहरा मैदान पर भी बूथ के पालक, संयोजकों के सम्मेलन में भी अनुमान से बहुत कम लोग आए। ये इलाका महापौर मालिनी गौड़ का विधानसभा क्षेत्र क्रमांक-4 है। जब राष्ट्रीय अध्यक्ष के सामने ही भाजपा के नेता भीड़ इकट्ठा नहीं कर पा रहे हैं, तो चुनाव में कोई चमत्कार कैसे होगा! फिलहाल भाजपा की सबसे बड़ी चिंता यही है।
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कलावती की काली साड़ी का खौफ 
    भाजपा नेताओं को लगातार दिखाए जा रहे काले झंडों से पुलिस वाले इतने घबरा गए हैं कि उन्हें समझ नहीं आ रहा कि क्या करें! भाजपा नेताओं दौरे से पहले कांग्रेसियों पर नजर रखी जाती है कि वे कौनसे कपडे पहने हैं। जैसे ही कोई काले कपड़ों में दिखाई देता है, उसे घेर लिया जाता है। ऐसा ही एक नजारा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की झाबुआ यात्रा के दौरान देखने को मिला। जिला पंचायत अध्यक्ष और कांग्रेस की नेता कलावती भूरिया को काली साड़ी पहने देख पुलिस वालों के हाथ-पैर फूल गए। तत्काल फैसला लिया गया कि कलावती भूरिया को उनके सरकारी आवास से बाहर ही नहीं निकलने दिया जाए! वही किया भी गया। लेकिन, उनको रोकने से विरोध इतना पनपा की पुलिसवालों को पसीना आ गया। कलावती भूरिया ने भी अपने समर्थकों के साथ बहुत देर तक पुलिस कार्रवाई का विरोध किया! जब बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं मिला तो आनन-फानन में अमित शाह का पुतला बनाकर उसका दहन किया गया। पुलिस की मज़बूरी ये थी कि उसे पुतला बुझाने के लिए कहीं से पानी तक नहीं मिल सका। जब कहीं से पानी जुगाड़ा गया, तब तक पुतला ख़ाक हो चुका था।
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राहुल की यात्रा से बेखबर क्यों कांग्रेस 
    समझा जा रहा था कि कारपोरेट कल्चर वाले कांग्रेस नेता कमलनाथ के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस की व्यवस्थाओं में सुधार आ जाएगा। लेकिन, देखा जा रहा है कि व्यवस्थाओं में सुधार आने के बजाए, उनमें बिगाड़ ही ज्यादा आया। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी के इंदौर, उज्जैन के प्रस्तावित चुनावी दौरे को लेकर भी कुछ तय नहीं हो सका। उनकी इंदौर यात्रा को लेकर तो हालत ये रही कि यही तय नहीं हो सका कि उन्हें कहाँ-कहाँ ले जाया जाए! रोड शो हो तो कहाँ से कहाँ तक! अचानक तीर्थ स्थल जानापाव का नाम जोड़ा गया। इसी बीच राहुल गाँधी की 15 अक्टूबर की यात्रा का कार्यक्रम कांग्रेस के दिल्ली कार्यालय से जारी हो गया। अभी इंदौर के रोड शो को फ़ाइनल किया जाता, इसी बीच कार्यक्रम स्थगित भी हो गया। शायद पार्टी हाईकमान भी समझ गया है कि राहुल गाँधी की यात्रा की जिम्मेदारी प्रदेश कांग्रेस को देना ठीक नहीं होगा! यही कारण है कि पार्टी अध्यक्ष के कई कार्यक्रम सीधे दिल्ली से मैनेज किए जा रहे हैं। राहुल गाँधी की इंदौर में कुछ लोगों से प्रस्तावित एक बड़ी मुलाकात की तो कांग्रेस के नेताओं को हवा भी नहीं है। अब ये मुलाकात क्या होगी और किनसे होगी, फिलहाल इस पर चर्चा नहीं!
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‘जयस’ के चुनाव लड़ने को लेकर मतभेद  
    राजनीति का चस्का बड़ा अजीब है। जिसे लग जाता है, वो इसे छोड़ना नहीं चाहता। आदिवासियों के संगठन ‘जयस’ को भी चुनावी चस्का लग गया है। इनकी सभाओं में आने वाली भीड़ और कॉलेज के चुनाव में जयस को मिली जीत ने इन्हें बौरा दिया है। ये संगठन विधानसभा चुनाव लड़ेगा या नहीं, इस मुद्दे पर संगठन ही एकमत दिखाई नहीं दे रहा। जयस के संयोजक डॉ हीरालाल अलावा ने घोषणा की है कि हम प्रदेश की आदिवासी बहुत 80 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करेंगे! लेकिन, झाबुआ जिले के संयोजक अनिल कटारा और महेश भाभोर इसके खिलाफ हैं। उनका तर्क है कि हमारा संगठन सामाजिक है और हमने आदिवासियों में व्याप्त विषमताओं को दूर करने के लिए ये संगठन बनाया है। हमारा मकसद चुनाव लड़ना नहीं है। दो तरह के बयानों के सामने आने के बाद कैसे माना जाए कि ‘जयस’ वास्तव में चुनाव लड़ेगा या नहीं! यदि अभी से संगठन में मतभेद हैं तो इसकी लम्बी उम्र की तो कामना ही नहीं की जा सकती!
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कांग्रेस के तीन नेताओं की तेरह राह!
    मध्यप्रदेश में कांग्रेस के तीन नेता किले लड़ा रहे हैं। ये तीनों हैं, ये सबको पता है। लेकिन, चुनावी यात्राओं को लेकर भी इन तीनों में सामंजस्य नजर नाह आ रहा। जहाँ कमलनाथ जाते हैं, वहीँ दो दिन बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया पहुँच जाते हैं। ऐसा कई जगह हुआ है। इसका कारण ये है कि प्रदेश कांग्रेस कार्यालय (पीसीसी) में ही सामंजस्य नहीं बन पा रहा। वास्तव में पीसीसी इन्हें अलग-अलग मानकर चल रहा है। कमलनाथ के चुनावी दौरों की तो पीसीसी को जानकारी होती है, पर ज्योतिरादित्य के कार्यक्रम सीधे तय हो रहे हैं। ये सब इसलिए हो रहा है कि पीसीसी सिर्फ कमलनाथ के दौरे तय करने का काम कर रहा है। सिंधिया के दौरे उनके समर्थकों के कहने पर तय हो रहे हैं। उधर, दिग्विजय सिंह तो बतौर समन्वय समिति के मुखिया पूरे प्रदेश में घूम ही रहे हैं। लेकिन, सबसे ज्यादा टिकट की मांग भी वही झेल रहे! यानी तीन नेताओं की तेरह राह है, कब कौन कहाँ टकरा जाए, कहा नहीं जा सकता।
(लेखक ‘सुबह सवेरे’ इंदौर के स्थानीय संपादक हैं)

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