फीके मसालों वाली कमजोर  फिल्म है मनमोहन सिंह की गाथा!  –  रील रिपोर्ट में एकता शर्मा 

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ई सालों बाद कोई फिल्म राजनीति में विवाद का कारण बनी है। ये है ‘द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ जो संजय बारू की किताब पर रची गई है। फिल्म बेहद कमजोर और दर्शकों को बांधने में असफल रही है। संजय बारू केवल चार साल मनमोहन सिंह के सलाहकार रहे। लेकिन, उन्होंने मनमोहनसिंह के पूरे दस साल के कार्यकाल पर किताब लिखी है और फिल्म भी उसी तरह बनी है। इसलिए दावे से कहा नहीं जा सकता कि फिल्म मनमोहन सिंह के कार्यकाल का सही-सही खुलासा करती है। फिल्म में कई ऐसे प्रसंग हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि वहाँ संजय बारू मौजूद नहीं होंगे! फिर भी उन्होंने घटनाओं को ऐसे लिखा है, जैसे सबकुछ उनके सामने घटा हो! कुछ ऐसे भी दृश्य हैं जिनमें सिर्फ़ दो ही लोग हैं, फिर लेखक ने अपनी कल्पना से कैसे पता कर लिया कि वहाँ क्या हुआ होगा! एक दृश्य में एक प्रतिनिधिमंडल के सामने मनमोहन सिंह फ़ाइल पटकते नज़र आते हैं। जब वहाँ बारू थे ही नहीं तो उन्हें उन दृश्यों का पता कैसे चला?
   इस फिल्म को राजनीतिक प्रश्रय मिला है, ये साफ नजर आता है। सेंसर बोर्ड ने जो फिल्म पास की, उसमें कुछ डायलॉग को आपत्तिजनक मानकर हटा दिया गया है। लेकिन, वे ट्रेलर में दिखाए गए हैं। इसे सेंसर बोर्ड के साथ धोखाधड़ी और नियमों का स्पष्ट उल्लंघन माना जा सकता है। कई जगह लेखक का बचकानापन भी स्पष्ट दिखाई देता है। वे अपने आपको देश की संवैधानिक व्यवस्था और प्रधानमंत्री कार्यालय से भी ऊपर दिखाते नज़र आते हैं। इससे लगता है कि उन्हें प्रधानमंत्री चुने जाने की प्रक्रिया और बहुमत से सरकार बनाने के लिए चुनी गई पार्टी की नीतियों का ही अंदाजा नहीं है। कई जगह वे पीएमओ के बड़े अधिकारियों की खिल्ली उड़ाते भी दिखाई देते हैं। संजय बारू प्रधानमंत्री के महज मीडिया सलाहकार थे! लेकिन, फिल्म में वे खुद को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और पीएमओ के अधिकारियों से भी ऊपर समझते हैं। वे कारपोरेट जगत प्रोफेशनल्स की तरह व्यवहार करते नजर आते हैं।
 संजय बारू कहते हैं कि वे प्रधानमंत्री मनमोहन के भाषण भी लिखते थे। पाकिस्तान पर मनमोहनजी को क्या बात करनी चाहिए, ये निर्णय भी वे बारू से पूछकर लेते थे। ये तथ्य कितने सही हैं, इस बात खुलासा कौन करेगा? मनमोहन सिंह तो कहेंगे नहीं कि सच्चाई क्या है! वास्तव में ये फिल्म मनमोहन सिंह की छबि खराब करने की साज़िश जैसी लगती है। फिल्म में एक डिस्क्लेमर भी चलता है कि यह फिल्म किसी भी घटनाक्रम, पात्र और प्रतीकों से अपने आपको अलग करती है। ये अमूमन हर फिल्म में होता है। इसके बावजूद फिल्म में नाम ,पार्टी, चुनाव चिह्न, नेता, घटनाक्रम और टीवी चैनलों के वास्तविक फुटेज का इस्तेमाल किया गया है। ऐसे में या तो डिस्क्लेमर के अनुसार फिल्म को काल्पनिक कहानी माना जाए?
   इस फिल्म में मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल के दस सालों का कालखंड दिखाया गया है। लेकिन, इन पूरे दस सालों में मनमोहन सिंह असहाय, लाचार और राजनीतिक रूप से नासमझ नज़र आए! मनमोहन सिंह ने अमेरिका के साथ न्यूक्लियर डील पर जो साहस दिखाया था, उसका ज़िक्र भी पूरा नहीं है। फिल्म में मनमोहन सिंह की नीतियों के सकारात्मक पक्ष भी ठीक से नहीं दर्शाए गए! खाद्य सुरक्षा क़ानून, मनरेगा और अंतर्राष्ट्रीय मंदी के समय सूझबूझ भरी नीतियों को दर्शकों के सामने नहीं रखा गया। देश की मज़बूत अर्थव्यवस्था में उनके योगदान का भी कहीं उल्लेख नहीं है। ये फिल्म की वे कमजोरियां हैं, जो सच्चाई को छुपाती नजर आती हैं।
  ‘द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ को यदि सिर्फ फिल्म के तौर पर लें और इससे जुड़े सारे विवाद भूल जाएं, तो ये बेहद कमजोर फिल्म है। प्रोडक्शन और ट्रीटमेंट के लिहाज से दर्शकों को निराश करती है। फिल्म में अनुपम खेर ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का किरदार निभाया है और अक्षय खन्ना ने संजय बारू का। पूरी फिल्म इन्हीं दोनों किरदारों के आसपास घूमती है। देखकर लगता है कि ये फिल्म काफी जल्दबाजी में किसी ख़ास मकसद से बनाई गई है। फिल्म में कई डिटेल्स में भी डायरेक्टर चूकते नजर आते हैं। मनमोहन सिंह स्वयं संजय बारू को अपना संजय बताते हैं। मतलब ये हुआ कि दर्शकों को मनमोहन सिंह की जिंदगी की महाभारत संजय बारू की नजरों से देखने का मौका मिलता है। अनुपम खेर ने मनमोहन सिंह के किरदार को हूबहू परदे पर उतारने की कोशिश तो की है, पर इसमें वे पूरी तरह सफल नहीं हुए। उनके चलने और बोलने का अंदाज कई बार दर्शकों को हँसा देता है। मनमोहन सिंह को फिल्म में जिस हास्यास्पद किरदार की तरह दिखाने की कोशिश की गई, वो खटकता भी है। कुल मिलाकर ये एक कमजोर फिल्म है, जो बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों से भी सामने आ गया!
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(लेखिका फिल्म समीक्षक और फिल्म इतिहासकार भी हैं)
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