मंत्रियो के असंवैधानिक बयान…. पर भानु चौबे का आलेख

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कुछ समय पहले यह खबर सामने आई थी कि भाजपा ने अपने मंत्रियों को अलग अलग सार्वजनिक बयान देने से रोका है और बोलने मे संयम बरतने की सलाह दी है |मंत्रियों के विवादास्पद कथन सरकार के लिए मुसीबत खड़ी कर सकते हैं | इस खबर की आधिकारिकता पर कुछ कहना तो संभव नहीं है लेकिन कुछ मंत्रियों के जो बयान अब सामने आ रहे हैं उन्हे देख कर लगता है कि यदि तब यह सलाह मंत्रियों को ना भी दी गई हो तो अब दे देनी चाहिए क्योंकि कुछ मंत्री ऐसे बयान दे रहे हैं जो ना केवल समाज मे विभाजन की भावना पैदा कर सकते हैं बल्कि संविधान की पंथ निरपेक्षता की मूल भावना को भी आहत कर रहे हैं | और केवल केंद्र या राज्य के मंत्री ही नहीं , कम से कम  संवैधानिक पद पर आसीन हरेक व्यक्ति को बोलने मे संविधान की भावना की कद्र करनी चाहिए और संयम बरतना चाहिए | अभी एक दिन पहले ही केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा उन दोषियों का स्वागत करने जा पहुंचे थे जिन्हे गौ वध के  मामले मे एक मुस्लिम व्यक्ति की पीट पीट कर हत्या करने के आरोप मे सजा हो चुकी है और उच्च न्यायलाय ने उन्हे जमानत दी है | सिन्हा जमानत मिलने का स्वागत कर न्यायालय मे आस्था जाता रहे थे उधर प्रधानमंत्री मोदी कुछ वरिष्ठ काँग्रेस नेताओं को जमानत मिलने की खिल्ली उड़ा रहे थे | एक ही सरकार और एक ही विचारधारा के लोगों के इस विरोधाभासी बयानबाजी की धूल अभी बैठी भी नहीं थी कि एक और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने एक विवादास्पद बयान दे दिया और साम्प्रादायिक भावनाएँ भड़काने के आरोप मे बंद बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ताओं से मिलने जेल जा पहुंचे |गिरिराज सिंह ने कहा कि बिहार सरकार हिंदुओं का दमन कर रही है | उन्होने सांप्रदायिक भावनाएँ भड़काने के आरोप मे पकड़े गए जेल मे बंद कार्यकर्ताओं की शांति कायम करने मे मदद के लिए प्रशंसा की | क्या केंद्रीय मंत्रियों के पास यही काम रह गया है या यह सब कुछ किसी एजेंडा के तहत किया जा रहा है | मंत्रियों के ऐसे विवादास्पद और संविधान विरोधी बयानों पर प्रधानमंत्री की चुप्पी रहस्यमय लगती है | यदि दोषी निर्दोष हैं या गलत ढंग से उन्हे दंडित किया गया है तो अदालत का विकल्प उनके लिए खुला है जिसकी सलाह आम नागरिको को सरकार अक्सर देती रहती है | मामला झूठा है तो अदालत मे उसे साबित किया जा सकता है |  उम्मीद यह की जाती है कि देश की पंथ निरपेक्षता और संविधान के पक्ष मे उन्हे ना केवल खुल कर सामने आना चाहिए बल्कि अपने मंत्री मण्डल के इन सदस्यों को फटकार भी लगानी चाहिए |  यही नहीं भाजपा संगठन को भी इन नेताओं को नसीहत देना चाहिए कि वे देश के सांप्रदायिक ताने बाने के  , संविधान के  , और अपने पद की निष्पक्षता की शपथ के इस तरह उल्लंघन नहीं करें | यदि संगठन की नसीहत नहीं मानी जाती है तो अनुशासन की कार्रवाई की जा सकती है | इससे ना केवल संविधान के प्रति विश्वास मजबूत होगा , सरकार के प्रति भी विश्वास की भावना मजबूत होगी | जब कई राज्यों और लोकसभा के चुनावों की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं , कतिपय नेताओं का यह व्यवहार भाजपा के लिए नुकसानदेह हो सकता है |
भानु चौबे
(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि”लोकल इंदौर”सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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