लोभसुर संहारक है भगवान श्रीगणेश का गजानन अवतार

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 भगवान श्रीगणेश का गजानन अवतार सांख्य ब्रम्ह का धारक है । उनका वाहन मुषक है और उन्हें लोभसुर का संहारक कहा गया है ।
एक बार देवाताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर कैलास पर गए और वे मॉं पार्वती के सौन्दर्य को देख कर उन्हें एकटक निहरने लगें । यह देख पार्वती क्रोधित हो गई । यह देख कर कुबेर डर गए मगर उसी समय भयभीत कुबेर से लोभासुर उत्पन्न हो गया ।वह प्रतापी और बलवान था।
लोभासुर दैत्यगुरू शुक्रचार्य के पास शिष्य बनने को गया । गुरू शुक्रचार्य ने उसे पन्चाक्षरी मन्त्र ओम् नम:शिवाय की दीक्षा दे कर वन में तपस्या करने भेज दिया । वर्षो तक बिना अन्न जल के वह भगवान शिव की तपस्या करने पर भगवान ने प्रकट हो कर उसे तीनों लोकों मे निर्भय होने का वरदान दिया ।
लोभासुर ने धरती पर विजय प्राप्त करने के साथ ही स्वर्ग पर भी आक्रमण कर इन्द्र को परास्त कर अमरावती पर अधिकार कर लिया ।परास्त इन्द्र विष्णु की शरण में गए और भगवान विष्णु गरूड पर सवार हो कर उससे युद्ध करने गए मगर शिवजी के वरदान के कारण उससे हार गए ।लाभासुर ने अपने दूत को भगवान शिव के पास भेज कर उन्हें युद्ध करने या कैलास छोडने का संदेश दिया । इस पर शिवजी ने अपने वरदान को ध्यान मे रख कैलास छोड दिया । लोभासुर पूरे ब्रम्हांड पर अत्याचार करने लगा । ऐसे समय में मुनि रैभ्य के कहने पर देवताओं ने श्री गणेश का स्मरण करने को कहा । देवताओं के आरधना से प्रसन्न हो कर गजानन ने लोभासुर के मुक्ति का वरदान दिया और शिवजी को लोभासुर के पास भेज कर शरण में आने या युद्ध का संदेश दिया । दैत्यगुरू शुक्रचार्य ने भी गजानन की महिमा बता कर उसे उनकी शरण लेने को कहा । लोभासुर भगवान गजानन के समक्ष कर उनकी शरण में आ गण ओर भगवान ने शरणागत की रक्षा कर उसे पाताल में भेज दिया ।

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