विश्वास का संकट गहराया केन्द्र में ..वरिष्ठ पत्रकार भानु चौबे की कलम से

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देश के पुलिस मंत्री ( गृह मंत्री ) दिल जीतने की बात करें और सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष को गठबंधन के साथियों के बीच विश्वास बनाने की कवायद मे जुटना पड़े , ये दोनों खबरें साथ साथ पढ़कर पता चलता है कि केंद्र और सबसे अधिक राज्यों मे सत्तारूढ़ होने का दावा करने वाले गठबंधन को उप चुनावों मे मिली कुछ बड़ी और उल्लेखनीय शिकस्त ने उसे हिला दिया है | हाल ही मे कर्नाटक का धक्का जरा ज़ोर से लगा है | यह राजनीतिक संकेत केंद्र मे सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए गंभीर इसलिए है कि एक , केंद्र मे उसे चार साल हो चुके हैं , कुछ राज्यों मे उसे एक से अधिक कार्यकाल मिल चुके हैं  तीन , इसी साल के अंत मे कुछ राज्यों मे विधानसभा चुनाव होने हैं और चार अगले साल के मध्य मे लोकसभा चुनावों मे उसे मतदाताओं के कई सवालों के जवाब देने हैं | भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की यह कवायद भविष्य मे किसी बड़े चुनावी नुकसान को टालने के लिए हो सकती है यह संकेत इस कवायद के टाइमिंग पर से कही जा सकती है | पुलिस मंत्री राजनाथसिंह के प्रकाशित एक लंबे साक्षात्कार मे पुलिस सुधार, उग्रवाद , आतंकवाद , केंद्र राज्य संबंध जैसे अपने विभागीय प्रश्नों पर उनके जवाब राजनीतिक हैं और कोई स्पष्ट संकेत नहीं देते हैं कि अधूरे काम कब तक हो जाएंगे | वे भी प्रधानमंत्री मोदी की शैली मे लंबे समय के लक्ष्य की बात करते मिलते हैं |एक दो उदाहरण इस बात को ज्यादा स्पष्ट कर सकते हैं | कश्मीर मे लगातार बढ़ते आतंकवाद पर गृह मंत्री का जवाब है कि कश्मीर मे शांति के लिए लंबा प्रयत्न करना होगा वे आगे कहते हैं कि इस बात की कोई गारंटी नहीं दे सकता है कि आपने जो कदम उठाएँ हैं , उनसे समस्या का समाधान हो ही जाएगा | ये उत्तर तर्क संगत हैं , सही हैं लेकिन जब वे और उनका दल सत्ता मे नहीं थे तब वे यह बात नहीं कहते थे | पार्टी दावा करती थी कि यदि उसे सरकार बनाने का अवसर मिला , बहूमत मिला तो पाकिस्तान की शरारतों और कश्मीर का इलाज कर दिया जाएगा | इसलिए अब गृह मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण संवेदनशील विभाग का मुखिया हो जाने के बाद उनके इन जवाबों पर सवाल उठना लाजिमी है | क्या गठबंधन इस स्थिति मे नहीं है कि गृहमंत्री ठोस जवाब देने का विश्वास व्यक्त कर सकें ? क्या इसी विश्वास के संकट के समाधान मे पार्टी अध्यक्ष जुट गए हैं ताकि अगले वर्ष लोकसभा चुनाव मे इस कमजोरी का नुकसान नहीं उठाना पड़े | एक उत्तर मे गृहमंत्री कहते हैं कि कश्मीर को छोडकर ( वही तो सबसे बड़ी समस्या है ) बाकी जगहों पर राहत महसूस की गई है | पठानकोट वायुसेवा केंद्र कश्मीर मे नहीं है जहां अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला हुआ , छत्तीसगढ़ मे नक्सली हमलों मे बड़ी संख्या मे सुरक्षा कर्मी मारे जा रहे हैं जहां इसी दल की सरकार है | अब भी वे और किसी का नहीं मोदी का नाम लेकर चुनाव मे जीत की संभावना बता रहे हैं | बीते चार साल मे तो इतने काम और उप्लाबधियान मिल जानी चाहिए थीं कि किसी एक व्यक्ति के भरोसे फिर चुनाव लड़ने की मजबूरी से बचा जा सके | परिदृश्य को देख कर कह सकते हैं कि सत्तारूढ़ गठबंधन और दल मे सब कुछ ठीक नहीं है और खुद अध्यक्ष को मैदान मे कूदना पड़ा है |

भानु चौबे

भानु चौबे पत्रकरिता जगत का ऐसा नाम है जो साफ सुथरी पत्रकारिता के लिए जाना जाता है , नई दुनिया में वर्षो तक सम्पादकीय में रहने वाले भानुचौबे जी आज भी बिना नाम की ख्वाईश के अनेक अखबारों में सम्पादकीय लिख रहे है .वे अपने आप में पत्रकरिता की एक मिसाल हैं .अपने शांत व्यवहार की तरह ही उनकी कलम भी शांति से पत्रकारिता के मूल्यों के लिए समर्पित है  लेकिन  उनकी कलम से लोकल इंदौर के लिए यह आलेख .

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