वक़्त और हालात के साथ बदलता रहा फ़िल्मी प्रेम! -रील रिपोर्ट में एकता शर्मा

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 अपने शुरूआती दौर से हिंदी फिल्मों का मूल आधार प्रेम ही रहा है। लेकिन, वही फ़िल्में सराही गईं, जिनमें प्रेम की गहराई और उससे जुड़ी आस्था का चित्रण सौम्य हुआ। समय के साथ चलने के जुनून में कुछ फिल्में सोच और प्रस्तुतिकरण के मामले में सबकुछ बदल डालने की कवायद में जुटी, पर ये बदलाव दर्शकों की पसंद पर खरा नहीं उतरा! दर्शकों को तो वही बदलाव लुभाता है, जो तार्किक और भावनात्मक हो। फिल्मों में प्रेम का अंदाज बदलने की कोशिशें भी कई बार हुई! लेकिन, चालीस और पचास के दशक की फिल्मों के प्रेम और आज के फिल्मी प्रेम में जमीन आसमान का अंतर फर्क आ गया है। यह अंतर स्वाभाविक तरीके से आया।
  प्रेम को अभिव्यक्त करने के तरीकों पर समय और स्थितियों का असर पड़ा है। शुरुआती दौर की फिल्मों में गीतों के माध्यम से प्रेम का संकेत किया जाता था। नायक-नायिका दूर ऐ ही आंखों-आंखों में प्रेम का इजहार करते थे. कह नहीं पाते थे। जब दिलीप कुमार आए तो उन्होंने प्रेम का दुखांत रूप उभारा। देव आनंद ने उसे रूमानी छवि दी, तो राज कपूर ने उसे आम आदमी की भावनाओं से जोड़ा। महबूब खान ने ‘अंदाज’ में दिलीप कुमार, राज कपूर व नरगिस को लेकर त्रिकोणीय प्रेम का नया फार्मूला अपनाया। ये हिट रहा तो उसी तरह की कई फिल्में बन गई। ऐसी फिल्मों में नायिका को संशय की स्थिति में उलझाए रखना निर्माताओं को ज्यादा भाया। दिलीप कुमार दुखांत प्रेम के ऐसे पर्याय बन गए।
 समय के साथ नायक-नायिका की चारीत्रिक खूबियां भी बदली। साड़ी का पल्लू मुंह में दबाकर खामोशी से हर दुख सहने वाली नायिका ने अपने व्यक्तित्व को विकसित करना शुरू कर दिया। रिश्तों को चुनने की प्राथमिकता भी उसने ही तय की। पिछले कुछ सालों से फिल्में अपने पारंपरिक तौर तरीके बदलने लगी हैं। प्रेम भी इससे अछूता नहीं रहा है। आज की युवा पीढ़ी की प्रेम को लेकर मान्यताएं और प्रेम को महसूस करने के उनके तरीके फिल्मों में खूब अभिव्यक्त हुए।
  दिलीप कुमार ने मेला, ‘अमर, बेवफा, संगदिल, नदिया के पार, जोगन आदि फिल्मों में प्रेम के विरह और तड़प को ऐसी शिद्दत से उभारा है कि प्रेम आग का दरिया लगने लगा। राज कपूर की ‘बरसात’ ने प्रेम की तड़प को उभारा। लेकिन, उसके बाद लय बदलकर ‘आवारा’ में उन्होंने प्रेम का नया रूप दिखाया। एक हाथ में वायलिन लिए राज कपूर और दूसरे हाथ में झूलती नरगिस उन्मुक्त प्रेम का प्रतीक बन गईं। दूर-दूर से प्रेम का इजहार करते रहने वाले नायक-नायिका को बेहद ग्लैमरपूर्ण अंदाज में आलिंगनबद्ध करने का सिलसिला प्रमुख रूप से इसी फिल्म से शुरू हुआ। इसके बाद तो एक दूजे के लिए, प्रेम कहानी, और लव स्टोरी जैसी फिल्मों ने प्रेम को अलग ही अंदाज में दिखाना शुरू कर दिया!
   आज की हिंदी फिल्में भी यही फार्मूला अपना रही है। यह स्थिति पिछले कुछ दशकों में ज्यादा पनपी और शालीनता की सीमा लांघकर विकसित हुई है। भारतीय फिल्मों में ही नहीं, दुनियाभर की हर भाषा की फिल्मों का प्रेम शाश्वत हिस्सा रहा है। यह समय के साथ साथ बदलता रहा है। कभी परदे की ओट से या पेड़ की टहनी सहलाते हुए नायिका अपने प्रेम का इजहार करती थी। प्रेम सामाजिक बंदिशों और रीति रिवाज में भी उलझा। एक दौर में प्रेम का दुखांत काफी पसंद किया गया। फिर नायिका विद्रोही हुई तो नायक बेवफा साबित हुआ। कैशोर्य प्रेम का बगावती अंदाज कुछ फिल्मों में दिखा। लेकिन, अब फिल्मों में प्रेम का वो रूप दिखाई देने लगा है जिसमें सही मायनों में प्रेम का शाश्वत रूप गायब ही हो गया! शायद इसीलिए ‘वैलेंटाइन-डे’ को ‘प्रेम दिवस’ कहने में जुबान लड़खड़ाती भी है!
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(लेखिका फिल्म समीक्षक है और फिल्मों के शोध से सम्बद्ध रही हैं)

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