समानांतर सिनेमा की अपनी ही दुनिया 

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ekta फिल्मकारों को जब लगता है कि एक जैसी फ़िल्में बनाकर वे टाइप्ड हो गए तो कुछ नया करने की कोशिश करते हैं। ऐसा ही नया प्रयोग है ‘कला’ या ‘समानांतर सिनेमा।’ इसे व्यावसायिक सिनेमा की मुख्यधारा से हटकर एक नए विकल्प के रूप में देखा जाता है। यह भारतीय सिनेमा का एक नया आंदोलन है, जिसे गंभीर विषय, वास्तविकता और नैसर्गिकता के साथ जोड़कर माना गया है। इस तरह के सिनेमा में एक नए अंदाज में सामाजिक और राजनीतिक घटनाक्रमों को सेल्युलाइड पर उतारने की कोशिश की जाती है। जापान और फ्रांस के सिनेमा में यर्थाथवादी दृष्टिकोण की फिल्मों को मिली सफलता से प्रेरणा लेकर सबसे पहले बंगाली सिनेमा में समानांतर सिनेमा का प्रवेश सत्यजीत रे, मृणाल सेन और ऋत्विक घटक जैसे फिल्मकारों के जरिए हुआ! इसके बाद हिन्दी सिनेमा में इस शैली की फ़िल्में बनना शुरू हुई!
  1950 से 1960 के दौरान बुध्दिजीवी फिल्मकार तथा कथाकार उस दौर की संगीतमय फिल्मों से हताश हो चुके थे। इसका मुकाबला करने के लिए उन्होंने एक ऐसी शैली विकसित की, जो अपने कलात्मक रूप के कारण ‘कला फिल्म’ कहलाई। इस जमाने की अधिकांश फिल्मों में सरकारी पैसा लगा था, ताकि कला फिल्मों को पोषित किया जा सके! इन नव-यर्थाथवादी फिल्मकारों में सत्यजीत रे का नाम सबसे ऊपर आता है। उनके बाद इस परम्परा को श्याम बेनेगल, मृणाल सेन, अदूर गोपालकृष्णन तथा गिरीश कासारावल्ली ने आगे बढ़ाया। सत्यजीत की सर्वाधिक प्रसिध्द फिल्मों में पाथेर पांचाली (1955), अपराजितो (1956) द वर्ल्ड आफ अप्पू (1959) याद रखने वाली फ़िल्में हैं।
  कला फिल्मों का दर्शक एक विशेष वर्ग होता है। सीमित दर्शकों के कारण इन फिल्मों की व्यावसायिक सफलता संदिग्ध मानी गई है। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं कि कला फिल्मों का निर्माण घाटे का सौदा है! ऐसी कई कला फिल्में हैं, जिन्होंने बाक्स ऑफिस पर पैसा भी बटोरा है। बिमल राय की ‘दो बीघा जमीन’ (1953) ने समीक्षकों की प्रशंसा के साथ व्यावसायिक सफलता भी प्राप्त की थी। इसे कॉन फेस्टिवल (1954) में अंतर्राष्ट्रीय सम्मान भी मिला। 1970 और 1980 के दौरान समानांतर सिनेमा ने जमकर विकास किया। श्याम बेनेगल की फिल्म ‘अंकुर’ को मिली व्यापक सफलता के बाद इस शैली के फिल्मकारों का हौंसला बुलंद हुआ! इसी दौर में शबाना आजमी, स्मिता पाटिल, रेहाना सुल्तान, अमोल पालेकर, ओम पुरी, नसीरुद्दीन शाह, अनुपम खेर, कुलभूषण खरबंदा, पंकज कपूर, गिरीश कर्नाड के साथ समय-समय पर रेखा और हेमा मालिनी का भी सानिध्य मिला।
  2000 के बाद एक बार फिर समानांतर सिनेमा थोड़े बदले अंदाज में लौट आया। इस दौर में प्रायोगिक फिल्मों के नाम से नए प्रयोग होने लगे। मणिरत्नम की दिल से (1998) और युवा (2004), नागेश कुकनूर की तीन दीवारें (2003) और डोर (2006), सुधीर मिश्रा की हजारों ख्वाहिशें ऐसी (2005), जान्हु बरूआ की मैने गांधी को नहीं मारा (2005), नंदिता दास की फिराक (2008) ओनिर की माय ब्रदर निखिल (2005) और बस एक पल (2006), अनुराग कश्यप की देव डी (2009) तथा गुलाल (2009) पियूष झा की सिकन्दर ( 2009 ) और विक्रमादित्य मोटवानी की उडान (2009) से एक बार फिर समानांतर सिनेमा का अंकुरण होने लगा है। हाल ही में सफलता के नए कीर्तिमान बनाने वाली फिल्म राजनीति, आरक्षण, कहानी और पिंक को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है।
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(लेखिका ‘फिल्मों के 100 साल’ पर हुए शोध कार्यों से संलग्न रही है)
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