17 साल की रेलम जिसने रच दिया इतिहास :जिसे खोजती है हर महिला …! जाने क्यों ?

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अंतर्राष्ट्रीय महिया दिवस पर विशेष………..

लोकल इंदौर ८ मार्च।  (प्रफुल्ल चौरासिया ‘आशु’) वो मात्र सत्रह साल की है उसे लिखना  पढ़ना भी नहीं आता ,पेट भरने के लिए मज़दूरी करने का ख्याल उसे भी अन्य आदिवासी महिला की तरह मन में आया।लेकिन उसके  मन ने उसे अन्य निरक्षर महिलाओं से अलग कुछ करने की चाह पैदा की।  अपने मन की बात उसने गाँठ बाँध ली और उसने नई राह ढूँढ ही ली।  डेढ़ साल पहले आलीराजपुर के सरकारी केंद्र से सिलाई की ट्रेनिंग ली और उसके बाद वह लेडिस टेलर बन गयी और आज वह अपने गाँव की ही नहीं इलाके की सफल टेलर है।  इस बार भगोरिया के मेले में वह अपनी सिलाई मशीन ले कर बैठी तो उसकी दुकान पर  उमड़ी महिलाओं की भीड़ ने एक नई मिसाल कायम कर दी। खाने-पीने और साज-श्रृंगार के सामानों की सजी दुकानों जितनी भीड़ उसे घेरे रही। 

ये नज़ारा था आलीराजपुर से 25 किमी दूर उमराली के भगोरिया हाट में  सजी रेलम की बुटिक पर । किसी पक्की दुकान के बाहर बने ओटले पर अपनी सिलाई मशीन लेकर  बैठी17 साल की रेलम चौहान  डिजाइनर चोली (आदिवासी पंरपरा अनुसार) हो, घाघरा हो या लुगड़ा… ऑर्डर मिलते ही एक दिन के भीतर सब कुछ तैयार कर देती हैं।उसे गिनती लिखना नहीं आता है, लेकिन हिसाब की पक्की है। किताबों की गहराई नहीं नाप सकी, लेकिन इंच-टेप से लुंगड़ा-चोली की लंबाई-चौड़ाई ठीक से माप लेती है।

रेलम कहती हैं डेढ़ साल पहले यह विचार आया कि पैसे कमाने का कुछ जरिया तलाशना चाहिए। मजदूरी नहीं करना चाहती थी। बहुत सोचा तो ख्याल आया क्यों न झाबुआ-आलीराजपुर में भी आदिवासी महिलाओं के लिए कपड़े सिलूं। मैं भी आदिवासी हूं इसलिए उनकी मांग बेहतर ढंग से जानती हूं। डेढ़ साल पहले आलीराजपुर के सरकारी केंद्र से सिलाई की ट्रेनिंग ली। सालभर पहले गांव में ही खुद का काम शुरू किया। इच्छा थी कि भगोरिया हाट में खुद की सिलाई की दुकान लगाऊं। हाट से दो दिन पहले वहां पहुंची। किराए पर दुकान ली और बाहर ओटले पर मशीन रखकर काम शुरू कर दिया। मैं खुद आदिवासी हूं इसलिए मुझे पता था कि महिलाओं को किस तरह के कपड़े पसंद आ सकते हैं? उस हिसाब से ही कपड़े सिले। पहली बार में ही अच्छी मांग रही।

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