अब इंदौर में नही बचे पान खाने के शौकिन

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लोकल इंदौर 30सितम्बर । खई के पान बनारस वाला ,खुल जाए बन्द अकल का ताला…..। अभिताभ बच्च्न की ​फिल्म डान का ये गाना अब गाना बन कर ही रह गया है। इंदौर में अब पान की खपत पहले की तुलना में मात्र 25 फीसदी ही रह गई हैं। इंदौर के आसपास बेटमा,गौतमपुरा और देपालपुर और अन्य गॉंवों में वर्षों से पान की खेती करने वालों किसानों ने पान की जगह सब्जियॉं उगाना शुरू कर दी है।

मालवा में पान खाने वालों की अधिक संख्या होने के कारण यहॉं का मालवी पान ,पटना के मघई और बनारस के बनारसी पान का मुकाबला करता था। पान खाने का जो सलीका बनारस में है वही शौक मालवा में है ।
मगर मालवा का ये शौक अब सिकुडता जा रहा है। इंदौर में मूलत पान इंदौर और मालवा से आता था ।रतलाम ,बडनगर, उज्जेन और इंदौर के आसपास इसकर पैदावार होने के अलावा यहा से बाहर भी पान भेला जाता था। गुटके और पाउच चलन ने इन किसानों के रोजगार पर ऐसा कहर ढाया कि अब पान के शौकिन ही नही बचें । पान की पैदावार और उसको पकने के बीच और उसे सम्भालने के बाद किसान को कोई खास फायदा नही होने से अब उन्होनें इसकी खेती करना ही छोड कर सब्जिया उगाना शुरू कर दिया।
इंदौर ​पिछले 30 सालों से अपनी सायकल पर पान की टोकरी पर पान लाद कर दुकान दुकान पर पान बेचने के काम में लगे सा​दिक भाई का कहना है… अब शहर में न तो पान की दुकानें बचे न ही पान खाने वाले। गुटका पाउच के कारण लबो की शान खाने वाले नही बचें पहले कुछ दुकानें थी जहॉं पनवाडी पान में मसाले नही अपने हाथों की कारीगरी डाल देते थे। दूध वाला कत्था ,चूना से पान का स्वाद ही नही होठों की लालिमा भी बढती थी जो अब बची ही नही।
अपने जमाने के एक गाने का जिक्र करते हुए कहते है कि पान की शौकिन मर्द ही नही औरते भी हुआ करती थी ….
पान खाये सैंयाँ हमारो
साँवली सूरतिया होंठ लाल\-लाल
हाय\-हाय मलमल का कुरता
मलमल के कुरते पे छींट लाल\-लाल
पान खाये सैंयाँ हमारो…..
बहरहाल अब शहर में पान यदाकदा खाने वाले ही है। पहले पान आदत में शुमार था अब शौक बन गया है ।
वैसे भी महज एक पत्ता भर नहीं है। हिंदू मान्यता के अनुसार सृष्टि के निर्माण के समय ही इसकी उत्पत्ति हुई थी। शास्त्रों में इसका वर्णन है। अमृत मंथन के समय आयुर्वेदज्ञ धन्वंतरि के कलश में जीवन देने वाली औषधियों के साथ पान का भी आगमन हुआ। यह भोजन को पाचन शक्ति प्रदान करता है। पान माउथफ्रेशनर तो है ही साथ ही ऐंटि-बायोटिक भी। यह कैल्शियम की मात्रा से भरपूर है। इसमें डाली जाने वाली सामग्री कत्था, चूना, सौंफ, लौंग, गुलकन्द (गुलाब की पत्ती से बनने वाला), मुलहट्ठी, सुपारी, नारियल का चूरा, इलायची, धनिए के बीज- ये सभी हाजमा दुरुस्त रखने में रामबाण का काम करते हैं

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