एक वीडियो ने कर दिये शंकरी कुलांचे अचानक बंद… गुस्ताखी माफ में नवनीत शुक्ला

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बात-बात पर सोशल मीडिया में कुलांचे भरने वाले समर्थक इन दिनों पूरी तरह चुप्पी साधे हुए हैं। यह समर्थक सिंधी समाज के बड़े नेता और इंदौर के लोकप्रिय सांसद शंकर लालवानी के समर्थक हैं। इन्हें पहले निर्देशित किया गया था कि दिनभर में शंकर भिया यदि अंगड़ाई भी लें तो सोशल मीडिया पर सबको पता लग जाना चाहिए कि उनकी अंगड़ाई पूरी हो गई है। इसी चक्कर में बैठे-बिठाए समर्थकों ने उनका लोकसभा का भाषण न जाने कहां से निकालकर डाल दिया और उन्हें कई नेताओं के यहां हाथ जोड़कर भारतनाट्यम करना पड़ा। इसके बाद से सोशल मीडिया पर ऐसी चुप्पी छाई हुई है कि शंकर भिया का नामलेवा भी नहीं दिखाई दे रहा है। कुल मिलाकर अब नई रणनीति में अपने समर्थकों को स्पष्ट कर दिया गया है कि राम-नाम फिर खंबा बचा के।

 सांसद लालवानी जिन्होंने मांगा अलग सिंधी राज्य और ……. देखे वीडियो https://youtu.be/VLXDuxcufI4

ताई का प्यार फिर क्यों दरकिनार…
सांवेर के लोग आज भी ताई का इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि ताई के समर्थक, कार्यकर्ता और नेता की आज भी ताई ही नेता हैं। विकास कार्यों के लिए सांसद निधि से कई बार ताई ने सांवेर का विशेष ध्यान रखा। उन्हें सांवेर से विशेष लगाव भी रहा है, परंतु इंदौर से जाने वाले तमाम दिग्गज नेताओं ने सांवेर में ताई के तमाम समर्थकों को लंबे समय से दरकिनार कर रखा है, वहीं ताई समर्थकों ने भी दूरी बना ली है। ऐसे में मुंह दिखाई की रसम के बीच कहीं ऐसा न हो कि आम के फल आने की तैयारी दिख रही हो और पाला पड़ जाए। अब यह थोड़ा रुककर ही पता लगेगा।

मंत्री के भाई, खास, हीरो नहीं बन पाए कुलपति…
अंतत: देवी अहिल्या विश्वविद्यालय पर एक बार फिर रेणू जैन की कुलपति पद पर स्थापना हो ही गई। हालांकि यह कोई खबर नहीं है। खबर यह है कि पहली बार इस विश्वविद्यालय पर कब्जा करने के लिए मंत्री के भाई से लेकर संघ के खास विद्या भारती जिनके पास उत्तरप्रदेश कनेक्शन, व्यापमं के हीरो से लेकर कई दिग्गज मैदान में थे। शतरंज के खेल की तरह हर प्यादे पर राजा, वजीर से लेकर हाथियों तक का जोर दिखाई दे रहा था, परंतु पहली बार सभी को दरकिनार कर अनुभव और देवी अहिल्या विश्वविद्यालय की पिछले दिनों बनी साख को सबसे ऊपर रखा गया है। रेणू जैन के कार्यकाल में ही देवी अहिल्या विश्वविद्यालय को ए प्लस भी मिला। इसके अलावा शिक्षा संतुलन भी सुधरा है। विनम्र स्वभाव के अलावा सहज उपलब्धि उनके लिए वरदान बनी। वैसे भी वे प्रतिष्ठित परिवार से संबंध रखती है। उनके एक भाई आईएएस अधिकारी भी है। परिवार में अन्य लोग भी सम्मानित पदों पर है। विश्वविद्यालय की नियुक्ति में पहली बार राज्यपाल भवन द्वारा बनाई गई कमेटी ने जेक जरियो को दरकिनार कर एक बेहतर नियुक्ति शहर को दी है।
(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। इसमें शामिल तथ्य तथा विचार/विश्लेषण ‘लोकल इंदौर’ के नहीं हैं और ‘लोकल इंदौर’ इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेता ।)

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