माफ करो महाराज, अब अपने तो शिवराज.गुस्ताख़ी माफ में नवनीत शुक्ला

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पच्चीस साल की राजनीति में पेलवान के कई गुरु बनते रहे और अब पेलवान भी किसी महागुरु से कम नहीं हो गए हैं। अपने राजनीतिक जीवन में चित्रकांत जायसवाल से राजनीति शुरू करने वाले पेलवान के पहले गुरु अशोक शुक्ला रहे। उसके बाद तेज गति न मिल पाने के कारण उन्होंने कई मठ में प्रवेश किया। इसके उपरांत वे मोतीलाल वोरा के पास रहे। फिर विद्याचरण के झंडे तले और इसके उपरांत उनके गुरु इंदौर में तात्कालीन कलेक्टर रहे अजीत जोगी हुए। बाद में गुरु गुड़ हो गए और चेले शकर हो गए। यहां से पेलवान ने सिंधिया परिवार के स्कूल में प्रवेश ले लिया, तब से वहीं की पढ़ाई करते रहे। अब भाजपा में आने के बाद उनके नए गुरु शिवराज हो गए हैं, यानी माफ करो महाराज, मेरे तो शिवराज।
फूंक-फूंक कर फुंकवा दिए 8 करोड़ से ज्यादा…
इन दिनों सांवेर के नए-नवेले भाजपाई उम्मीदवार पेलवान भाजपा की राजनीति को देखते हुए फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं। कदम नहीं भी रखें तो फूंकने में कोई कमी नहीं रहती है, यानी आसपास के नेताओं को फूंकते रहो। यदि फूंकने से चूक जाएंगे तो कोई भी पीछे से फूंक देगा। इसी फूंका फांकी के बीच पेलवान के आठ करोड़ रुपए से ज्यादा फुंका गए हैं। कारण यह भी है कि बड़े बैनर का प्रोडक्शन हाउस और उसमें अपने को हीरो बनना हो तो फिर पैसे लगते ही हैं। इस बार सांवेर में फिलिम आर.के. स्टूडियो के बैनर तले बन रही है। इसीलिए घाघरा-चोली से लेकर, हंडे-मटके तक और फिर मटके से चलकर सुपारी तक दिखाई दे रहा है। मल्टी कलर फिलिम में पचास हजार से ज्यादा महिलाओं ने कलश लेकर बेहतरीन नृत्य प्रस्तुत किया है। परदे पर आने के लिए और फिलिम में शामिल होने के लिए घर-घर सुपारी दी गई है। वैसे भी शहर से गांव जाने वाले नेता सबसे पहले सुपारी देने का ही काम करते हैं। दिक्कत यह है कि सुपारी अगर सांवेर के लोगों ने ले ली तो इस बार कई रिकार्ड बनेंगे। वैसे भी कहा जाता है कि सांवेर हो या राऊ-बिजलपुर, इंदौर में कहावत है- देख लेना, राऊ-बिजलपुर से नहीं आया हो। दूसरी ओर सांवेर में इंदौर से जाने वाले भाजपा नेताओं के दौरे के बाद जब वे वापस आकर संगठन में यह बताते हैं कि हम चार बूूथ निपटा आए, उस दौरान सांवेर के नेता सांवेर में कहते हैं कि चार भूत आए थे, निपटा दिए। निपटाने-सलटाने के चक्कर में कहीं ऐसा न हो कोई निपट जाए और कोई सलट जाए। इन दिनों सांवेर में जिन नेताओं को देखने के लिए भीड़ लालायित रहती थी, अब वे नेता भीड़ देखने को लालायित रहते हैं। अब हर बार तो शुद्ध घी के लड्डू भीड़ लाने के लिए नहीं खिलाए जा सकते।
नोट: इस लेख में व्‍यक्‍त व‍िचार लेखक की न‍िजी अभिव्‍यक्‍त‍ि है। लोकल इंदौर का इससे कोई संबंध नहीं है।
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