गणेश जी तो दादा के ,बाकी सब चार इंच कम गुस्ताख़ी माफ में नवनीत शुक्ला

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बाकी सब चार इंच कम है…
कल क्षेत्र क्रमांक दो में सीएसपी ने बैठक लेकर सभी को आग्रह किया कि पांडालों में इस बार गणेश प्रतिमाएं नहीं बैठाई जाएंगी। बात में दम है, परंतु उनके लिए यह क्षेत्र नया है। जब वे पांडालों में गणेश नहीं बैठने के बारे में बता रहे थे, तब पीछे बैठे लोग यह बता रहे थे कि नंदानगर में दादा दयालू का पांडाल बनना शुरू हो गया है। गणेश प्रतिभा भी स्थापित होने की तैयारी हो गई है। अब उनकी देखादेखी चार और पांडाल यहां पर लग जाएंगे। वैसे भी क्षेत्र क्रमांक दो में वहीं का कानून काम करता है, क्योंकि यहां नंदानगर पांडाल में गणेशजी के बजाय रमेशजी बैठते हैं। गणेशजी तो बापड़े व्यवस्था में लगे रहते हैं। इस महोत्सव का पूरे क्षेत्र को इंतजार रहता है क्योंकि मोदक के भोग के साथ रोज नए-नए मिष्ठान शुद्ध घी के खाने को मिलते है। इसके अलावा क्षेत्र के तमाम बच्चों को भी सम्मान और पुरस्कार भी दिए जाते है। फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता में क्षेत्र के बच्चे सुबह से ही मुंह पर नीला, पीला, हरा, गुलाबी, कच्चा-पक्का रंग पोतकर नल, नील, नर नाग, सुरगंधर्व बनकर घूमते रहते है। यह सब दादा के प्रताप से ही संभव हो पाता है।
आइये बनाए गोबर के गणेश…
इन दिनों भाजपा के लोकप्रिय सांसद शहर में गोबर से गणेश बनाने को लेकर अपनी निजी संस्था के माध्यम से प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने जा रहे हैं। हालांकि कुछ और भाजपा नेता भी गोबर से गणेश बनाए जाने को लेकर अपने क्षेत्रों में प्रशिक्षण दे रहे हैं। क्षेत्र क्रमांक दो में भी यह कार्य पाटनीपुरा साईं मंदिर पर पिछले एक माह से चल रहा है। हालांकि इन दिनों भाजपा में जिस प्रकार की राजनीति हो रही है, लोगों की समझ में आ गया है कि यही पार्टी है, जिसमें गोबर से गणेश बना जा सकता है। इसके उदाहरण भी अब तो दिखने लगे हैं। आप भी मन ही मन यह तो बता ही सकते हो कि कहां गोबर से गणेश बन गए। वहीं यह भी समझना होगा कि पिछली बार चुनाव के दौरान लहर में भी कुछ लोग नहीं जीत पा रहे थे। यह समझना होगा कि वे गोबर तो छोड़ों मिट्टी से भी गणेश नहीं बना पाएंगे। हालांकि कई जमीनी नेताओं का मानना है कि अभी तो जिस प्रकार की राजनीति हो रही है उसमें तो गोबर के ही गणेश पूजे जाएंगे।
यह है शहर के नगराज…
नगिनों की इस शहर में कमी नहीं इसके दो उदाहरण है पहले में पूरा शहर कोरोना महामारी में उलझा हुआ है। ले दे कर गरीबों पर बिमारी फैलाने का ठीकरा फूट रहा है। अब पहला उदाहरण देखिये कासलीवाल भवन के सेठ ताश पत्ते खेलने के चक्कर में गले मिलने के साथ गले पड़ रहे थे परिणाम यह हुआ कि दादा से कोरोना को प्यार हो गया। इधर उनके साथ ताश पत्ते खेलने वाले तब तक खेल ही रहे थे जांच के बाद विशेष में भर्ती हुए और रिपोर्ट आ गई तो वहीं उनके साथ खेल रहे कल्याण भवन के समझदार लोग भी क्वारंटाइन होने के बजाए बाजार में घूम रहे हैं। अब यहां से भी गुच्छा निकला है तो वहीं ताश पत्ते खेलने वाले ही प्रकाश जैन जिनकी छप्पन दुकान पर दुकान है बिमारी की टेस्टिंग के बाद भी दुकान खोलते रहे। क्या मालूम कितनों को टिका दी होगी। अनपढ़ लोग यदि ऐसा करे तो समझ में आता है यहां तो पढ़े लिखे ही ज्यादा तकलीफ दे रहे हैं। अब दूसरा उदाहरण कुछ ऐसा है कि एक कॉलोनी में एक मकान पर शेड बनाने के लिए देर रात ठेले पर बांस और बल्ली लेकर जा रहे व्यक्ति का ठेला खराब हो गया तो उसने एक घर के सामने बांस बल्ली उतारकर ठेला दूर खड़ा कर दिया। सुबह भैया उठे तो देखा की पूरा मोहल्ला घूर रहा है। जिसे देखों पूछ रहा है कहां से लाये मुसीबत एक घंटे में ही सफाई दे देकर भैया परेशान हो गये। अचानक ठेले वाला सामान उठाने आया तो भैया ने दो चांटे रसीद कर दिये कहा तुरंत मैरे यहां से सामान उठाओं वर्ना बैठे बैठाये मोहल्ले वाले जाति विशेष का बना देंगे।
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