जिमना बंद अब जिम शुरू… गुस्ताख़ी माफ में नवनीत शुक्ला

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इन दिनों क्षेत्र क्रमांक दो में मेघदूत पार्क में क्षेत्रीय विधायक दादा दयालू और मंत्री तुलसी पेलवान ने एक जिम का शुभारंभ किया। वैसे भी इसी क्षेत्र में जिम और जीमने वाले सबसे ज्यादा दिखते हैं। पार्क में दादा दयालू और पेलवान ने तोलन करने वाली मशीन पर आमने-सामने बैठकर शुभारंभ की प्रक्रिया निभाई। इस दौरान दादा दयालू ने अपने दोनों पैर हवा में उठा दिए तो भाजपा में नए-नए आए पेलवान ने एक पैर जमीन पर टिका कर रखा। उन्हें मालूम है कि इस पार्टी में दादा के भरोसे दोनों पैर ऊपर उठा लिए तो न जाने कब हवा में झूलना पड़ेगा। वैसे भी संतुलन बनाने में दादा दयालू की कोई जोड़ नहीं है। वो तो गनीमत है कि उन्होंने दोनों पैर ही उठाए। यदि अब भी मामा ने उनकी ओर ध्यान नहीं दिया और कहीं उन्होंने दोनों हाथ भी उठा दिए तो इंदौर की छह सीटों पर खड़े होने वाले उम्मीदवारों को पसीना छूट जाएगा। दादा बोलते नहीं हैं, क्योंकि वे जानते हैं बोलने के बाद फिर कोई भी बोलने वाला नहीं रहेगा। हालांकि अभी तो वे हरिद्वार के बाद पश्चिम बंगाल कूच कर गए है।
भगवा फहराने वालों को त्यौहार के लाले पड़े...
लाहौर हो या श्रीनगर में भगवा और तिरंगा फहराने का दावा करने वाले शहर के राजनेता को अपने शहर में ही अपना त्यौहार मनाने के लाले पड़ गए। दो दिन पूर्व जिला प्रशासन ने राज्य सरकार की ताजा गाइड लाइन शहर पर ठोक दी। इसमें होलिका दहन पर गले मिलने से लेकर धुलेंडी को गले पड़ने तक की रोक लग गई। भाजपा के ही एक बड़े नेता को परंपरागत रात नौ बजे बाद उनके मूल भाजपा स्वभाव ने उन्हें जागृत कर दिया। सवारी जैसे ही आई, उन्होंने सोशल मीडिया पर मैदान पकड़ लिया, परंतु आधी रात तक वे भी भाजपा की नीतियों और नई कुरीतियों से मार खा गए। सुबह उनकी आवाज बंद हो गई। यह वही शहर है, जिसमें हर चौथा आदमी अपने घर के बाहर लिख रहा था-हां, मैं चौकीदार हूं, परंतु इस बार चौकीदारों की आवाज भी कान्ह नदी के पानी में ठीक उसी प्रकार बह गई, जिस प्रकार इस समय इंदौर की राजनीति बह रही है। कोई नहीं आया कि हा मैं उमेश शर्मा हूं। आश्चर्य यह भी है कि उमेश शर्मा के डमरू बजाते ही कांग्रेसी राजनेता उनके द्वारे लपक पड़े। ऐसा लगा, बस अभी हाल ही निपटारा हो जाएगा, परंतु आश्चर्य होता है कि इतने झटके खाने के बाद भी इन नेताओं में इतनी बुद्धि नहीं चली कि उनके दरवाजे जाने के बजाय अपनी लाइन अलग खींच लेते। ये नेता भी ऐसे लपके जैसे प्रेमी-प्रेमिका के बीच कंधे पर सिर रखने का मामला हो। कंधे की तलाश में इस कदर अंधे क्यों हो गए जो भाजपा की रीति-नीति को नहीं समझ पाए। कांग्रेस थोड़ी है कि मना करने के बाद भी कपड़े उतारकर मैदान में उतर जाए। यह बताता है कंधे मजबूत होने चाहिए मजबूर नहीं। जो लोग पहले दिन शहर हिलाने की बात कर रहे थे, वे जिलाधीश मनीषसिंह से मिलने के बाद खुद ही रातभर अकेले हिलते रहे। कारण यह है कि शहर में किसकी पूंछ उठाई जाए।
(इस आलेख में व्‍यक्‍त विचार लेखक की निजी अभिव्‍यक्‍ति और राय है, लोकल इंदौर डॉट कॉम से इससे कोई संबंध नहीं है)
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