Indore Gustaakhi maaf: न भार न प्रभार लटकी पड़ी है सरकार… नवनीत शुक्ला

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न भार न प्रभार लटकी पड़ी है सरकार…
भाजपा में संगठन और सत्ता के बीच राजनीति करने वाले तमाम नेता अब यह मानने लगे हैं कि यह सरकार भाजपा की नहीं है। साथ ही सत्ता-संगठन में अलग-अलग गुट अपनी ताकत के अनुसार शतरंज की बिसात जमा रहे हैं। इन दिनों भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष वी.डी. शर्मा, हितानंद शर्मा और सुहास भगत की तिकड़ी पूरी तरह अकेले काम कर रही है। हितानंद शर्मा भाजपा के अगले संगठन महामंत्री होंगे। दूसरी ओर सत्ता में अब फैसले ज्योति बाबू के इशारे पर ही होना हैं, क्योंकि सरकार उन्हीं के कंधों पर टिकी हुई है। इस गुट में भी नरेंद्रसिंह तोमर, शिवराजसिंह चौहान और ज्योतिरादित्य अलग से अपनी राजनीति को स्थापित किए हुए हैं और यही कारण है कि इंदौर में भी अब भाजपा के कई दिग्गज मुख्यमंत्री के साथ धीरे-धीरे कम हो रहे हैं, जबकि तुलसी पेलवान उनके साथ ही देखे जा सकते हैं। एक और गुट जो धाकड़ नेताओं का है, उसमें कैलाश विजयवर्गीय, नरोत्तम मिश्रा और कमल पटेल भी बंगाल चुनाव के बाद अपने पांच गांव मांगने की तैयारी में लग गए हैं। सत्ता और संगठन के बीच चल रही खींचतान का सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि सौ दिन बाद मंत्रिमंडल का विस्तार और एक साल बाद जिलों के प्रभार भी नहीं बंट पा रहे। नगर इकाइयां छह-छह माह से ज्यादा होने के बाद भी गठित नहीं हो पा रहीं। निगम-मंडलों में मामा ने मंत्रियों को ही चाबी दे दी है, यानी अब कोई संभावना फिलहाल नहीं है। तीसरा साल चल रहा है, इस साल निकाय चुनाव के साथ समय निकलने के बाद एक साल और कार्यकर्ताओं के लिए रहेगा। इसके बाद अगले चुनाव की तैयारियां ही दिखाई देंगी।
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एक ओर निकाय चुनाव को लेकर बड़ी नाटक-नौटंकी दिखाई दे रही है। ऐसा लग रहा है बस चुनाव होने में ही हैं। दूसरी ओर अधिकारियों का मानना है कि एक अप्रैल से शुरू होने वाली परीक्षाएं 18 मई तक चलेंगी। ऐसे में सरकारी स्कूलों में चुनावी केंद्र नहीं बन सकते हैं, यानी अभी 18 मई के बाद चुनाव की लॉलीपॉप कार्यकर्ताओं को अभी चूसने में कोई तकलीफ नहीं रहेगी। एकाध महीने की बात है, परंतु निर्वाचन आयोग का कहना है कि पूरी चुनाव प्रक्रिया के लिए न्यूनतम सैंतीस दिन का समय हर हालत में लगता है, यानी 18 मई को भी आचार संहिता लागू हुई तो चुनाव 20 जून के बाद ही हो पाएंगे। चुनाव आयोग बारिश के समय में किसी भी क्षेत्र में चुनाव की अनुमति नहीं देता है। अगले तीन महीने बाद यानी फिर सितंबर-अक्टूबर में जाकर ही चुनाव होने की संभावना बनेगी। अभी भी चुनावी तैयारियों का मजमा तो दिखेगा। साथ ही कोरोना के मरीज भी दिखाई देंगे। इसके अलावा भाजपा के दिग्गज नेता अब अगले एक माह आसाम और बंगाल में एड़ी-चोटी का जोर लगाते दिखेंगे और ऐसे में यह भी संभव नहीं है कि नाचे-कूदे हम और खीर खाएं मदारी, यानी हम वहां पार्टी को बचाएं और यहां पार्टी हमारे कार्यकर्ताओं की लुटिया डुबाए। कोई नहीं चाहेगा, उसके क्षेत्र में उसके बिना अनुमति उम्मीदवार तय हो जाए।

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