Indore political: इंदौर में नहीं बचा अब राजनेताओं में दम….! गुस्ताखी माफ में नवनीत शुक्ला

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शहर की राजनीतिक विरासत शून्य…
अच्छे राजनेता बनने के लिए बहुत जरूरी होता है आपके दरबार में खड़े रहने वाले रत्नों का चयन। रत्नों से मतलब, माल लाने वाले नहीं, हर विषयों के जानकार। इस समय शहर के राजनेताओं के पास विषयों के जानकार नहीं बचे हैं। इसीलिए मुख्यमंत्री ने शहर को लेकर किए जाने वाले सारे फैसले अधिकारियों पर छोड़ दिए हैं। उन्होंने भी माना है कि इन्हें खाने-कमाने दो। सब अपने कामों में व्यस्त हैं। पूरा शहर एक बार फिर पिछले साल अप्रैल के हालात में पहुंच गया है, बल्कि उससे भी ज्यादा बदतर हालत में पहुंच गया है। अभी तक शहर में राजनीति कर रहे राजनेता इस मामले में जागे नहीं हैं। सारा मामला प्रशासन के कंधे पर आ गया है। प्रशासन का खौफ इस कदर हो गया है कि शहर में अब यह समझ में आ गया कि खौफ से ही शहर चलाया जाता है। किसी जमाने में शहर के पास दो बड़े राजनेता थे, जो निर्णयों के पहले और निर्णयों के बाद समीक्षा करते थे। दोनों के पास शहर के बेहतरीन सलाहकार मौजूद थे। लोकसभा अध्यक्ष रहीं ताई की टीम में दस ऐसे सलाहकार थे, जो अपने विषयों के और व्यवस्था के बेहतर जानकार थे। यही स्थिति कैलाश विजयवर्गीय की रही, परंतु अब शहर के तमाम नेताओं के पास सलाहकारों की भारी कमी है। उनके पास रोबोट जैसे कार्यकर्ता पड़े हैं, जो उनके इशारे पर काम करते हैं और इसी का परिणाम है शहर नेताओं से पूरी तरह मुक़्त हो चुका है। मुख्यमंत्री ने भी नेताओं की क्षमता पहचान ली है। राजनीति का मूल सिद्धांत है कि सही समय को सही रूप से भुना लेने वाला ही भविष्य का नेता होता है, वरना इस शहर में अच्छे-बड़े नेताओं को भुनते हुए भी देखा है।
बोलबाले हो गए अब वी.डी. शर्मा के…
अंतत: संघ में अब नए सरकार्यवाह के रूप में दत्तात्रय होसबोले स्थापित हो गए हैं। शिक्षाविदों में उनकी गिनती की जाती है, परंतु अब मध्यप्रदेश में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष वी.डी. शर्मा दस गुना ज्यादा ताकतवर हो गए हैं, यानी अब प्रदेश के फैसलों में मामा को वी.डी. शर्मा का विशेष ध्यान भी रखना होगा। वी.डी. शर्मा समय से पहले मुख्यमंत्री पद की दौड़ में भी शामिल हैं। आपको यह बता दें कि वी.डी. शर्मा भाजपा की राजनीति में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के माध्यम से आए थे और सरकार्यवाह होसबोले भी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के ताकतवर पदाधिकारी रह चुके हैं। 2014 में वी.डी. शर्मा को शिवराजसिंह चौहान ने विधानसभा उम्मीदवार के लायक भी नहीं समझा था। दो बार उन्हें दरकिनार कर दिया था, परंतु अब वी.डी. शर्मा वो ताकत हैं, जिन्हें दत्तात्रय होसबोले के कहने पर ही पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नंदू भैया ने चंद घंटों में ही महामंत्री पद पर स्थापित कर दिया था। इसके बाद खजुराहो से लोकसभा भी उन्हें इसी चैनल से मिली। नए राजनीतिक समीकरण में अब वी.डी. शर्मा संगठन के साथ सत्ता में भी ताकतवर दिखेंगे। इसी के साथ प्रदेश के संगठन महामंत्री सुहास भगत की रवानगी भी तय है। उल्लेखनीय है कि एक माह पूर्व इसी कॉलम दत्तात्रय होसबोले के नए सरकार्यवाह बनने का ऐलान भी किया गया था। आने वाला समय अब मामा के लिए उतना आसान सत्ता और संगठन के लिए नहीं रहेगा, जितनी वे तीन कार्यकाल में देख चुके हैं। दूसरी ओर नए घमासान के चलते ज्योति बाबू की समझ में यह नहीं आ रहा है कि किसके साथ पत्तल में बैठना है, क्योंकि यहां यह तय नहीं है कि जिसके सामने पत्तल होगी, उसे ही स्वादिष्ट भोज मिलेगा या इसे यूं कहा जाए कि भाजपा में तय नहीं है कि भेरू कौन होगा। जिसे आप पत्थर बांधकर छोड़ देते हैं, वह भेरू निकल जाता है और जिसे भेरू समझकर फूल चढ़ाते रहते हैं, वह पत्थर निकल जाता है।
मैदान में उतरने से पहले इनसे कुछ सीख लें…
भाजपा में चुनावी रणनीति बनाने वालों में कुछ ही नाम ऐसे है जो किसी भी वार्ड में जाए अपने चुनावी रणनीति को लेकर जगह बना लेते है। सबके अपने अपने समीकरण है। इस मामले में क्षेत्र क्र.1 में दिनेश शुक्ला की जोड़ भी नहीं है। वे इन दिनों किसी उम्मीदवार के लिए बड़ी कुशल रणनीति के साथ तैयारी करते देखे जा सकते है। वार्ड में पारिवारिक रिश्ते, सामाजिक रिश्ते, व्यक्तिगत रिश्ते, संघ और संगठन के रिश्ते की पूरी फेहरिस्त देखी जा सकती है। यही स्थिति क्षेत्र क्रं.२ में राजेंद्र राठौड़ और चंदू शिंदे को लेकर देखी जा सकती है। दोनों के चुनाव लड़ने का तरीका अलग अलग है। परंतु राजेंद्र राठौड़ सालभर दूसरे वार्डों में भी पारिवारिक रिश्तों को सबसे ज्यादा महत्व देते है। चंदू शिंदे कार्यकर्ताओं से यारबाजी के लिए जगह रखते है।
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