इंदौर प्रेस क्लब अध्यक्ष अरविन्द तिवारी का साप्ताहिक कॉलम

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 बात शुरू करते हैं यहां से….
 ▪ “वीडी” यानी भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा ने 24 जिलों में जो नए अध्यक्ष बनाए हैं उससे उनका एजेंडा साफ हो गया है। ज्यादातर अध्यक्ष  45 साल से कम उम्र के हैं और इनमें भी उन लोगों का बाहुल्य है जो विद्यार्थी परिषद के दौर में शर्मा के खासमखास हुआ करते थे। इंदौर के नवनियुक्त शहर अध्यक्ष गौरव रणदिवे भी इनमें से एक हैं। प्रदेशाध्यक्ष  के रूप में कुछ सालों पहले ऐसी ही लाइन प्रभात झा ने भी खींचने की कोशिश की थी। खैर… नई नियुक्तियों से शर्मा ने यह संकेत भी दे दिया है कि जल्दी ही आकार लेने वाली प्रदेश पदाधिकारियों की सूची में भी यदि ज्यादातर नए नाम देखने को मिलें तो चौंकने की जरूरत नहीं। यह भी स्पष्ट है कि शर्मा जो भी कर रहे हैं वह दिल्ली से तय लाइन का ही एक हिस्सा है।
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▪तुलसी सिलावट यूं तो बहुत सामान्य रहते हैं और धीरे-धीरे भाजपा के रंग में भी रंगे चले जा रहे हैं लेकिन उपचुनाव की बात हो और प्रेमचंद गुड्डू का मैदान में सामने आने का जिक्र कोई कर दे तो तुलसी भाई थोड़ा बेचैन होने लगते हैं। भाजपा ने भले ही राजेश सोनकर को जिलाध्यक्ष बनाकर उपचुनाव में तुलसी भाई की राह को आसान कर दिया हो लेकिन अभी तक तो भाजपा में ही दिख रहे गुड्डू  सपने में भी सिलावट के लिए परेशानी का सबब बन जाते हैं। 1998 में गुड्डू ने जिस अंदाज में सांवेर से चुनाव लड़कर जीत हासिल की थी उसे अनदेखा करना किसी के भी बूते की बात नहीं।
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▪कुछ महीने पशुपालन विभाग में बिताने के बाद डीपी यानी देवेंद्र पाल अहूजा फिर मेन स्ट्रीम में आ गए हैं। अब वे जल संसाधन विभाग के प्रमुख सचिव होंगे। सूबे में कांग्रेस की सरकार के दौर में जब राघवेंद्र सिंह के स्थान पर डीपी को उच्च शिक्षा आयुक्त बनाया गया था तो उन्होंने जीतू पटवारी जैसे तेजतर्रार मंत्री को भी परेशानी में डाल दिया था। सामान्यतः अफसरों से पंगा न लेने वाले पटवारी को आखिर मुख्यमंत्री के दरबार में दस्तक देकर आहूजा की अपने विभाग से रवानगी करवाना पड़ी थी। देखें अब क्या स्थिति बनती है।
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▪️सब को साधने में महारत रखने वाले पी नरहरि को आखिर  जनसंपर्क विभाग से क्यों विदा होना पड़ा? कई कहानियां सामने आ रही हैं पर जो सबसे अलग है वह यह कि एक महीना भी मुख्य सचिव नहीं रह पाए एम. गोपाल रेड्डी से नजदीकी नरहरि को भारी पड़ गई। एक ही राज्य से वास्ता रखने वाले नरहरि और रेड्डी हमेशा एक दूसरे के मददगार रहे हैं।शिवराज सिंह चौहान के तीसरे कार्यकाल में जब रेड्डी एक मामले में बुरी तरह उलझ गए थे तब नरहरि ने ही एक संवैधानिक संस्था से जुड़े मामले में उनकी मदद की थी। कमलनाथ के मुख्यमंत्री काल में जब रेड्डी वजनदार हुए तब उन्होंने नरहरि का वजन बरकरार रखवाया। यही नजदीकी इस दौर में पसंद नहीं की गई और नरहरि को जनसंपर्क विभाग से विदा होना पड़ा। इस विदाई में मुख्यमंत्री की कम और प्रशासनिक प्रमुख की भूमिका ज्यादा नजर आ रही है।
▪️ पंडित जी यानी गोपाल भार्गव को अब कुछ लोग नई भूमिका में देखना चाहते हैं। सीधा सीधा मुद्दा यह है कि सागर से गोविंद सिंह राजपूत मंत्री बना दिए गए, भूपेंद्र सिंह शिवराज जी के चहेते  हैं यह सब जानते हैं। शैलेंद्र जैन और प्रदीप लारिया भी दौड़ में हैं। चूंकि ये सब सागर से हैं लिहाजा कोशिश यह हो रही थी कि समीकरण साधने के लिए पंडित जी को विधानसभा अध्यक्ष बना दिया जाए। इस बात को बहुत ही सुनियोजित तरीके से हवा भी दी गई। भार्गव ने पहले तो इसे अनदेखा किया पर जब लगा कि उनकी चुप्पी को सहमति न मान लिया जाए तो दिल्ली से लेकर भोपाल तक यह स्पष्ट कर दिया कि कुछ भी हो जाए विधानसभा अध्यक्ष तो नहीं बनूंगा। प्रदेश मंत्रिमंडल का विस्तार जिन कारणों से रुका हुआ है उसमें एक कारण यह भी है।
▪️आईपीसी केसरी की गिनती भी उन अफसरों में होती है जो सत्ता किसी की भी हो या मुख्यमंत्री कोई भी हो हमेशा मलाईदार पदों पर ही रहे हैं। वे कमलनाथ जब केंद्र में मंत्री थे तब उनके निजी सचिव रह चुके हैं, वहां से वापसी हुई तो मध्यप्रदेश में अहम भूमिका में रहे। कमलनाथ जब मुख्यमंत्री थे तब केसरी कितने वजनदार थे यह किसी से छुपा हुआ नहीं है। उनका एक पांव भोपाल में रहता था तो दूसरा दिल्ली में। शिवराज सिंह ने उन्हें कोरोना वायरस वार रूम का स्टेट कंट्रोलर बनाया गया। लेकिन इस जिम्मेदारी के साथ केसरी न्याय नहीं कर पाए ।इसी का नतीजा है इस कठिन दौर मे अपर मुख्य सचिव वाणिज्य कर जैसे सबसे महत्वपूर्ण पद से उनकी रवानगी। भेजा भी एनवीडीए में है, जहां अभी ज्यादा कुछ करने को बचा नहीं है।
▪️तेजतर्रार आईएएस अधिकारी राधेश्याम जुलानिया की मध्यप्रदेश में असमय वापसी हो रही है। दिल्ली में पदस्थापना के दौरान अपने तेवरों का एहसास करा चुके जुलानिया मध्यप्रदेश में किस भूमिका में होंगे, यह सब जानना चाहते हैं। जुलानिया मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस के बैचमेट हैं और वरीयता सूची में उनसे ऊपर भी। ऐसे में तो यही माना जा रहा है कि उन्हें वल्लभ भवन से बाहर ही रहना पड़ेगा। समस्या यह भी है कि एम गोपाल रेड्डी के राजस्व मंडल का अध्यक्ष बनने के बाद जुलानिया के लिए चुनिंदा पद ही बचते हैं। जुलानिया उन अफसरों में भी नहीं है जो अपने साथ न्याय ना होने की स्थिति में चुपचाप बैठे रहें। और फिर उनके व संघ के संबंध भी किसी से छुपे हुए नहीं हैं।
  *अब बात मीडिया की*
🔸इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार सुदेश तिवारी सहारा समय मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ के हेड हो गए हैं। वह जल्दी ही कार्यभार ग्रहण कर लेंगे। सुदेश सहारा समय के इंदौर ब्यूरो को लंबे समय तक हेड कर चुके हैं
🔸 भोपाल की सीनियर जर्नलिस्ट मुक्ता पाठक अब ind 24 न्यूज़ चैनल में एसोसिएट एडिटर की भूमिका निभाएंगी।
🔸 सांध्य दैनिक डी एन एन में लंबी पारी खेल चुके और एनडीटीवी से जुड़े हेमंत शर्मा अब मुनीष शर्मा के अलविदा कहने के बाद सांध्य गुड इवनिंग के संपादक होंगे। ‌
🔸 इंदौर में तत्कालीन महापौर मालिनी गौड़ के मीडिया सलाहकार रहे पत्रकार साथी विनोद पाठक अब दैनिक प्रजातंत्र की संपादकीय टीम का हिस्सा हो गए हैं।
🔸 इंडिया टीवी और ind24 से ताल्लुक रखने वाले इंदौर के पत्रकार बाबू शेख  जल्दी ही ACN न्यूज़ को भी हेड करेंगे।
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*(बस आज इतना ही, फिर मिलेंगे अगले सप्ताह)*
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