यह भाजपा का दुर्भाग्य है कि वह पंद्रह सालों में केवल एक रमेश मेंदोला ही बना पाई….. गुस्ताखी माफ़ में नवनीत शुक्ला

0
970
दा  दा दयालु यानि माँ के द्वारा ”रमी” नाम से पुकारे जाने वाले से रमेश मेंदोला बनने तक के सफर में संस्कारों के बीज पर वटवृक्ष बनने में जहां रमेश मेंदोला की माँ का धार्मिक स्वभाव और पिता के राजनीतिक संस्कार महत्वपूर्ण रहे हैं। देश के पचास चुनिंदा विधायकों में रमेश मेंदोला का नाम शामिल होना कोई बड़े आश्चर्य की बात नहीं है। जहां लोग राजनीति में आगे बढऩे के लिए कंधे ढूंढते रहते हैं वहां मित्रता का सही अर्थ यहीं से सीखा जा सकता है। चालीस सालों में न नेता बदले न कार्यप्रणाली बदली। जब शहर के कर्णधार उन्हें गुंडे बताने में नहीं चूक रहे थे तो उन्होंने कोई विरोध नहीं किया जिसने जैसा चाहा उसने वैसा देखा। उन्होंने कभी शरीफ होने का दावा भी नहीं किया जबकि राजनीति में शरीफ दिखना और होना में बड़ा फर्क होता है। क्षेत्र क्रमांक २ में वे अब अजेय योद्धा के रुप में अपनी पहचान स्थापित कर चुके हैं। दयालु के पास ना कैश था, ना ऐश थी, पर अपने गरीब स्वभाव से वोटों के लखपति दादा हो गए। कई बार राजनीति के शिकार होने के बाद भी उन्होंने आगे बढऩे के बजाए पीछे खसकना बेहतर समझा। रमेश मेंदोला को राजनीति विरासत में मिली जबकि कैलाश विजयवर्गीय को उनके तमाम साथियों ने राजनेता बनाया। उनके दोस्तों ने उन पर विश्वास कर उन्हें आगे बढ़ाया। इसीलिए कैलाश विजयवर्गीय आज भी दोस्ती के लिए अपने लोगों के बीच जाने जाते हैं। रमेश मेंदोला के पिता चिंतामन मेंदोला को शायद नई पीढ़ी न जाने पर एक जमाने में जब श्रमिक क्षेत्र में मजदूरों की राजनीति पूरे शहर में सबसे ऊपर होती थी उस दौरान वे इंटक के बड़े नेताओं में गिने जाते थे। वे मजदूरों का दर्द बेहद करीब से समझते थे। उन दिनों में मजदूर परिवारों का संघर्ष केवल खाने के लिए ही होता था। ऐसे में वे ऐसे नेता बनें जिन्होंने कई घरों में अनाज भिजवाने की व्यवस्था अपने स्तर पर की बचपन से रमेश मेंदोला ने अपनी माताजी से धर्म संस्कार सीखे तो राजनीति में आगे बढऩे का हुनर भी पिता से सीखा। इसीलिए वे दांवपेच भी उनके पिता वाले ही चलते है। जिन्हें घर छोड़कर आना है वे न जाने कब घर पहुंच जाते हैं पता नहीं लगता। इसलिए रमेश मेंदोला पैदायशी राजनेता है।
पंद्रह साल भाजपा की राजनीति में कई चढ़ाव उतार के बाद भी उन्होंने आगे बढऩे के लिए समझौते नहीं किये। क्षेत्र क्रमांक दो में रिकार्ड मतों से जीतने के बाद भोपाल बैठे भाजपा के दिग्गज नेताओं को कैलाश विजयवर्गीय की एक बड़ी लाईन खींचती हुई दिखाई देने लगी। अब यहां से रमेश मेंदोला को इंदौर के भी नेताओं ने सबसे ज्यादा निशाने पर लेना शुरु किया जो लोग कैलाश विजयवर्गीय को निशाने पर नहीं ले पा रहे थे वे भी मेंदोला पर भिड़ गये। सब सहने के बाद भी मेंदोला के स्वभाव संस्कृति में कोई परिवर्तन नहीं आया है। इस बीच वे उन हुनरबाज नेताओं में भी शुमार हो गये जो रातोरात एक लाख वोट की बढ़त को चंद घंटों में ढाई सौ वोट तक भी पहुंचा सकते है। इससे भोपाल के नेताओं को यह समझ में आ गया कि यह रातोरात बहुत कुछ कर सकते है। अब पिछले चुनाव में जब ऐसा अवसर आया कि योद्धा को अन्य क्षेत्र के लिए उतारने का विचार भी शुरु हुआ। इस दौरान इंदौर में ताई और संघ के एक पूर्व बड़े प्रचारक की बड़ी भूमिका क्षेत्र क्रमांक २ में ही उम्मीदवार बनाने के लिए रही। संघ प्रचारक ने संघ के दिग्गजों को यह समझाया कि भाजपा का दुर्भाग्य है कि वह पंद्रह सालों में केवल एक रमेश मेंदोला ही बना पाई यदि भाजपा पूरे प्रदेश में ७० रमेश मेंदोला भी तैयार कर देती जो अपने क्षेत्रों में अपने दम पर पार्टी को निकाल कर लाते तो आज भाजपा को यह दिन नहीं देखना पड़ते। यदि रमेश मेंदोला का क्षेत्र बदला गया तो भविष्य में कोई नेता अपने क्षेत्र को इतना मजबूत बनाने का प्रयास नहीं करेगा। अब रमेश मेंदोला को पहले राऊ फेंका गया परंतु इस दौरान जीतू पटवारी ने दादा दयालु से अपनी दोस्ती का आग्रह कर कोई और मैदान देखने को कहा बहुत कम लोग जानते है कि पटवारी और रमेश मेंदोला की बेहतर दोस्ती भी है। दादा दयालु को भी लगा कि यदि मैने कोई और मैदान नहीं देखा तो बिना बात के इसे दिशा मैदान जाना पड़ेगा। फिर मामला आया क्षेत्र क्रमांक तीन में इस दौरान महेश जोशी परिवार के कट्टर समर्थक और रमेश मेंदोला के कट्टर समर्थक एक ही जगह पर उलझ रहे थे। समर्थकों ने यह भी कहा कि यदि दयालु तीन नंबर में आये और जोशी परिवार से आमना सामना हुआ तो हमें जोशी परिवार के साथ ही तन मन धन से जाना होगा। रमेश मेंदोला कई संकटों में उलझे रहे एक बार उनके मन में यह भी विचार आया कि चुनावी मैदान से हट जाए। परंतु इस बीच ताई के करीबी लोगों ने जो रमेश मेंदोला के भी करीब है क्षेत्र क्रमांक दो से ही रमेश को मैदान में उतारने के लिए आग्रह किया।  चुनाव के पहले जब ताई इंदौर आई तो उन्होंने परदेशीपुरा स्थित सफेद मंदिर पर रमेश मेंदोला से एकांत चर्चा की उस दौरान उन्होंने भी यह इच्छा व्यक्त की दादा दयालू दो नंबर से ही उम्मीदवार बने। दादा ने भी अपनी इच्छा व्यक्त कर दी जो यह थी कि यदि ज्यादा खींचतान हो तो वे चुनाव नहीं लडऩा चाहते। ताई ने कहा हर हाल में दो नंबर से ही तुम चुनाव लड़ोगे फिर दो नंबर की राजनीति में परिवर्तन शुरु हो गया। आज भी जब भाजपा में नेताओं को योग्य कार्यकर्ताओं की जरुरत नहीं है नेता अब सलाह देने वाले कार्यकर्ता को हैय की दृष्टि से देखते हैं अब उन्हें रोबोट या यसमेन के रुप में काम करने वाले कार्यकर्ता की जरुरत होती है। ऐसे में आज भी क्षेत्र क्रमांक दो में सलाह देने वाले लोगों की और समस्या बताने वाले लोगों की सुनने की आदत पूरी तरह देखी जा सकती है। और इसीलिए लोग कहते है कि दादा दयालु ने गरीबी और भुखमरी दोनों बहुत करीब से देखी है और इसीलिए वे शहर के बड़े आयोजन इसी क्षेत्र में इसलिए करते है कि भूखे पेट भजन न होये गोपाला इस मामले में उन्होंने किसी से कहा था जब वे दशहरा मैदान पर अपनी माताजी को संतों की कथा सुनवाने लेकर जाते थे तब वहां माइक पर अनाउंस होता था कि मिल क्षेत्र से आने वाले लोगों की बैठने की व्यवस्था पीछे की गई है। तब उन्होंने किसी से कहा था एक दिन वह आयेगा जब मिल क्षेत्र में बड़े आयोजनों में मजदूरों के परिवार आगे बैठकर इस धर्मकथा का आयोजन भरपेट किया करेंगे।
लोकल इंदौर का एप गूगल से डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें... 👇 Get it on Google Play

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here