‘झूठ बोले कव्वा काटे …’ फिर भी फिल्मों में झूठ का कारोबार!  – रील रिपोर्ट में एकता शर्मा

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 हिन्दी फ़िल्मों के इतिहास को टटोला जाए तो इसमें सच-झूठ का खेल जमकर चला! हीरो से लगाकर विलेन तक ने झूठ बोल बोलकर कभी हीरोइन को फंसाया तो कभी भरमाया! जब से फ़िल्में बनना शुरू हुई, हीरो या विलेन झूठ बोलते और कहानी को बढ़ाते रहे हैं। हीरो भले ही कितना आदर्शवादी हो, उसे झूठ बोलना क्षम्य है। कई फिल्मों में हीरो, हीरोइन को खुलेआम झूठ बोलते दिखाया गया। फिल्मों में कुछ ऐसे किरदार होते हैं, जो झूठ का कारोबार करने के लिए होते हैं। इनमें से अधिकांश पात्र खलनायक या उसके नुमाइंदे होते हैं। यदि फिल्म राजे राजवाड़े पर आधारित हो तो राज्य का खोया उत्तराधिकारी अपनी बाहों पर नकली राजचिह्न बनाकर हाजिर हो जाता है। जीतेन्द्र अभिनीत फिल्म ‘वारिस’ में यही ड्रामा चलता रहा। नासिर हुसैन की लगभग हर फिल्म का खलनायक एक झूठा पात्र होता था। यदि सौतेले माँ बेटे पर आधारित फिल्म हो तो परदे पर झूठ परोसने का काम ‘मामा’ के सुपूर्द किया जाता है। इस तरह के फिल्मी मामाओं को मदन पुरी, जीवन, कन्हैयालाल, अनुपम खेर से लेकर कादर खान ने कभी गुर्रा के हुए तो कभी गुदगुदाने हुए बखूबी पेश किया।    फिल्मों में झूठ का अपना अलग ही कारोबार है! राजकपूर की सर्वाधिक सफल फिल्मों में से एक ‘बॉबी’ में तो ऋषि कपूर को चिढ़ाकर डिम्पल कपाड़िया गाना भी गाती है ‘झूठ बोले कव्वा काटे!’ फ़िल्मों के गानों में भी झूठ का जादू खूब चला है। सैंया झूठों बड़ा सरताज निकला, झूठ बोले कौआ काटे, सजन रे झूठ मत बोलो, झूठा कहीं का मुझे ऐसा मिला, दो झूठ कहे एक सच के लिए, झूठ बोले कौआ काटे जैसे गाने आज भी श्रोताओं के लबों पर सजे हुए हैं। कहने मतलब यह कि चाहे सिनेमा में सच के बजाए ‘झूठ’ काे लोगों ने मनोरंजन के रूप में ज्यादा पसंद किया। यानी परदे पर कहानी को आगे बढ़ाने के लिए दशकों से झूठ चलता रहा है और चलता रहेगा!
सिनेमा मे लगभग सारे कलाकारों ने परदे पर झूठ बोला है। किसी फिल्म में ऋषि कपूर झूठ बोलकर ‘झूठा कहीं का’ कहलाए तो इसी तरह की दोहरी भूमिका निभाते हुए राजेश खन्ना ने ‘सच्चा झूठा’ का तमगा लटकाया। झूठ पर आधारित फिल्मों में क्योंकि मैं झूठ नहीं बोलता, अंगूर, सच्चे का बोलबाला, दो झूठ, पति पत्नी और वो, सफेद झूठ, चुपके-चुपके और ‘मिस्टर नटवरलाल’ सहित दर्जनों फिल्मों ने बॉक्स आफिस पर सिक्के बरसाए हैं। सिनेमा में झूठ के सहारे केवल प्यार ही नहीं होता बल्कि दुष्कर्म भी होता है। दर्जनों फ़िल्में ऐसी हैं जिनमें भाई की खोज में शहर आई बहन को कोई खलनायक झूठ बोलकर या तो उसकी इज्ज़त से खिलवाड़ करता है या उसे कोठे पर बैठा देता है। ऐसे पात्रों से सीएस दुबे और अनवर हुसैन जैसे कलाकारों की दाल रोटी चलती थी। ‌परदे पर झूठ को सच बनाकर पेश करने में प्राण, विनोद खन्ना, शक्ति कपूर और शत्रुघ्न सिन्हा को माहिर माना जाता रहा है। जब यह झूठ बयां कर रहे होते हैं, तो इनका शातिर चेहरा दर्शकों की तरफ रहता है जिससे पता चल जाता है कि वे कितने झूठे हैं।
फिल्मों में ऐसे किरदार निभाने के लिए हिन्दी सिनेमा में कुछ कलाकार हमेशा फिट पाए गए। सिनेमा में झूठ को विश्वसनीय तरीके से आगे बढाने में बीते जमाने के नायक शम्मी कपूर को माहिर माना जाता था। शम्मी कपूर ने पर्दे पर झूठ बोलकर कई नायिकाओं का दिल जीता! ‘प्रोफेसर’ में वे बेरोजगारी दूर करने के लिए झूठ बोलकर हीरोइन को पढाते-पढाते प्यार का पाठ पढ़ाने लगते हैं! ‘ब्लफ मास्टर’ में वे लगातार झूठ पर झूठ बोलकर दर्शकों को गुदगुदाते रहते हैं। यदि नायिका गरीब हो तो अमीर नायक झूठ बोल कर गरीब बन जाता है और नायक गरीब हो तो अमीर नायिका झूठ बोलकर गरीबी का नाटक करके प्यार की दौलत लूटकर फिल्म को आगे बढाता है। ऐसे में कभी राज कपूर नूतन के हाथों ‘अनाड़ी’ बनते हैं तो कभी अपर्णा सेन के हाथों ‘विश्वास’ टूट जाने पर जीतेन्द्र ‘एक धनवान की बेटी ने निर्धन का दामन छोड़ दिया …’ गाते हैं।
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(लेखिका फिल्म समीक्षक हैं और फिल्म इतिहास के शोध कार्य से सम्बद्ध रही हैं)
ब्लॉग : https://ektakanajariya.blogspot.com
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