यादें राहत : किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है – हेमंत पाल

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 देश के मशहूर शायर राहत इंदौरी शायरी को पसंद करने वालों के बीच वे ‘राहत साहब’ के नाम से लोकप्रिय थे। उनका अचानक जाना उर्दू शायरी की दुनिया के लिए बड़ा नुकसान है। वे मुशायरों की दुनिया के कामयाब और मक़बूल शायर थे। वे उन शायरों में शुमार थे, जिनकी शायरी मुशायरों तक सीमित नहीं थी। चाहने वालों को उनकी शायरी अपने दिल से निकलती महसूस होती थी। उनकी सबसे बड़ी खासियत थी कि उनकी शायरी मीर और ग़ालिब की तरह थी, लेकिन, उसकी जमीन अलग थी। वे मीर और ग़ालिब की तरह शायरी लिखने वाले थे, पर उनकी अपनी पहचान थी।
फिर वही मीर से अब तक के सदाओं का तिलिस्म,
हैफ़ ‘राहत’ कि तुझे कुछ तो नया लिखना था!
  राहत इंदौरी को वे लोग भी दिल से पसंद करते थे, जो उर्दू जुबान के जानकार नहीं थे! राहत साहब ने देश की हर छोटी-बड़ी घटनाओं पर शायरी लिखी। यहाँ तक कि बाबरी ढांचा ढहने पर भी उनका तो शेर था।
मेरी ख़्वाहिश है कि आंगन में न दीवार उठे,
मेरे भाई मेरे हिस्से की जमीं तू रख ले!
  नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और भारतीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के विरोध में प्रदर्शकारियों के लिए उनका एक शेर बुलंद आवाज बन गया था। प्रदर्शन के दौरान राहत इंदौरी की इस शायरी ने खूब सुर्खियां बटोरी। विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों के हाथों में मशहूर राहत इंदौरी के इस शेर के पोस्टर भी देखे गए।
सभी का ख़ून है शामिल यहां की मिट्टी में,
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है!
  राहत इंदौरी का जन्म 1 जनवरी 1950 को कपड़ा मिल कर्मचारी रफ्तुल्लाह कुरैशी और मकबूल उन निशा बेगम के यहाँ हुआ। वे चौथी संतान थे। उनकी शुरूआती शिक्षा इंदौर के नूतन स्कूल में हुई। फिर उन्होंने इस्लामिया करीमिया कॉलेज से 1973 में अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की। 1975 में बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल से उर्दू साहित्य में एमए किया। 1985 में भोज मुक्त विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।
अभी तो कोई तरक़्की नहीं कर सके हम लोग,
वही किराए का टूटा हुआ मकां है मिया!
  शुरू में उर्दू साहित्य का अध्यापन कार्य शुरू किया और छात्रों के मुताबिक वे कॉलेज के अच्छे व्याख्याता थे। लेकिन, फिर वे मुशायरों में व्यस्त हो गए। पूरे देश-विदेश से उन्हें उन्हें मुशायरों के लिए बुलाया जाने लगा। उनकी क्षमता, लगन और उर्दू शब्दों की विशिष्ट शैली थी ,जिसने बहुत जल्दी व बहुत अच्छी तरह से जनता के बीच लोकप्रिय बना दिया। तीन, चार साल में उनकी शायरी ने उन्हें उर्दू साहित्य की दुनिया में एक प्रसिद्ध शायर बना दिया था। 19 साल की उम्र में उन्होंने अपने कॉलेज के दिनों में पहली शायरी सुनाई थी।
हमसे पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे,
कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते!
यह कहते-कहते राहत इंदौरी खुद ही इन दुनिया को छोड़कर दूसरी दुनिया के मुसाफिर हो गए।
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