नर्मदा बाद में आएगी गंगा नहा गए नेताजी… गुस्ताखी माफ में नवनीत शुक्ला

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सांवेर में नर्मदाजी तो जब आएगी तब आएगी परंतु सांवेर उपचुनाव में कोई नहाए ना नहाए, भाजपा के ही एक राजनेता गंगा नहा गए। कारण यह है कि लंबे समय से लगातार उनकी उधारी बनी हुई थी, परंतु सांवेर में ढाई लाख लड्डू बंटने के साथ ही जहां हलवाई का हिसाब चुकता हो गया, नया खाता भी कुछ दिन चलेगा, परंतु दूसरी ओर साठ से सत्तर रुपए के बीच लिए गए हंडे के साथ गुजरात से एक सौ दस रुपए में आई साड़ियां दो सौ बीस रुपए तक पेलवान को दे दी गईं। वैसे भी पेलवान समुद्र में नहाकर आए हैं, इसलिए उन्हें पांच-पचास साड़ियों के भाव से कोई अंतर नहीं पड़ता, परंतु फिलहाल सांवेर की गंगा में यह तो समय बताएगा कि कौन निपटेगा, परंतु कुछ लोगों के हिसाब जरूर निपट गए हैं। कुछ के हिसाब चुनाव के बाद निपट जाएंगे और बचे-खुचे चुनाव में निपट में जाएंगे। इसे कहते है गंगा नहाना। हालांकि एक बात गांव के नेता भी समझ रहे है कि जो सरकार 500 करोड़ के लोन के लिए 50 जगह घूम रही है वह 2500 करोड़ की इस योजना को कैसे पूरा करेंगे पर नारियल फोड़ने में जाता क्या है।

ज्योति बाबू इंदौरी जड़े मजबूत करने में लगे…
मालवा निमाड़ की राजनीति में अब नए समीकरण बनना शुरू हो गए हैं और यह समीकरण बता रहे हैं कि अब मालवा-निमाड़ की राजनीति में कांग्रेस से भाजपा में आए ज्योति बाबू का परचम लहराएगा। अब वे अगला चुनाव इंदौर से ही लड़ेंगे और इसके लिए उन्होंने अपनी गोटें बैठाना भी शुरू कर दी हैं। आप सोच रहे होगे कि वे पुराने क्षेत्र शिवपुरी से क्यों नहीं लड़ेंगे… तो आपको बता दें, वहां पर भाजपा से जीते सांसद केपी यादव को अमित शाह द्वारा सिंधिया के भाजपा में शामिल होने के पहले यह वचन दिया गया है कि उनकी सांसदी अगली बार भी इसी क्षेत्र से बरकरार रखी जाएगी। ऐसे में इंदौर में उन्होंने प्रशासनिक नियुक्तियां भी प्रारंभ करवा दी हैं। पहली नियुक्ति हो चुकी है। अब इसके बाद वे इंदौर में लगातार सक्रिय भी दिखाई देंगे। महाराष्ट्रीयन वोटों के आंकड़े के अनुसार भी उनके पक्ष में समीकरण दिख रहे हैं। लंबे समय ताई यहां पर सांसद रही हैं और उनका आशीर्वाद भी उनके साथ रहेगा। बाकी के आशीर्वाद की चिंता कम है। बचे दो आशीर्वाद तो एक बार घर खाना खाकर रिश्तों की बुनियाद तो शुरू हो गई है, दो-तीन बार और भोजन-भंडारे होने के साथ ही इतिश्री रेवाखंडे अध्याय समाप्त हो जाएगा। दूसरी ओर इस बार लहर से सांसद बने शंकर भिया भी यह मान रहे हैं कि अब लहर नहीं आएगी और नदी किनारे हिलोरे भी नहीं आएंगे, ऐसे में वे भी नए समीकरण की जुगत में लग गए हैं। नए समीकरण राज्यसभा के भी दिख रहे हैं। जब भाग्य मेहरबान हो तो फिर…।

(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। इसमें शामिल तथ्य तथा विचार/विश्लेषण ‘लोकल इंदौर’ के नहीं हैं और ‘लोकल इंदौर’ इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेता ।)

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