अपनी जिंदगी से भी कचरे को साफ़ कर स्वयं को नम्बर 1 बनाना होगा …अंकुर कपूर का आलेख

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इंदौर शहर का स्वच्छता के पैमानों पर अव्वल आना सराहनीय है । नागरिकों और सरकार ,शासन  की साझेदारी केे इस मुकाम में सबकी लगन परस्पर दिखती है ।  सुबह जब नगर निगम की गाड़ी पर बजता हुआ गीत “ है हल्ला  हो ” सुनाई देता है तो सफाई के प्रति निश्चय फिर प्रबल हो जाता है । लेकिन, क्या सडकों  या गली-कूचों  का साफ हो जाना, घर से प्रतिदिन का कचरा निगम की गाड़ी में ओझल हो जाना, और कचरे की अदृश्यता को सफाई मान लेना ही सफाई का पैमाना है? क्या हम अपनी जिन्दिगियो  से कचरे को अदृश्य कर के स्वयं न.1 समझते हैं?
कचरा रोज हमारे घरो या गलियों में से नियमित रूप से हटाया जाता है, और हम अमूमन यह समझ बैठते हैं कि ‘कचरा अब नहीं है!’. हम शायद यह भूल जाते हैं कि कचरा अदृश्य नहीं होता। हमारे घर,गलियों  की सफाई कही और, किसी और बस्ती की गन्दगी बन जाती है । गार्बेज डम्प्स और लैंडफिल्स की समस्या कभी भी हमारी नजरों और चेतना को परेशान नहीं करती, क्योंकि हमने अपनी जिन्दगियों को सुविधा और निजी-व्यक्तिवाद (इंडीविजुलिस्म) में लीन कर लिया है।
सारा ध्यान और ऊर्जा कचरे को गीला और सूखा समझते हुए, हरे या नीले डब्बे में डंप करने लगा दिया गया है। जन-चेतना में कभी ये सवाल नहीं उठते कि कचरा ना उत्पन्न करें, ज्यादा से ज्यादा कचरा पुन:इस्तेमाल कर सके, या ऐसी चीजे खरीदें जिसमे कम से कम पैकेजिंग हो ताकि कम कचरा बने । हम अपने आप को घर-गलियों की सफाई से ना, बल्कि किस घर ने कितना और कैसा कचरा प्रतिदिन उत्पन्न किया, उस पैमाने पर तोले ।  अगर हम तीन ऐरो वाले प्रचिलित चिन्ह जिसका मतलब रिड्यूस, रीयूस, रीसायकल होता है, उस पर ध्यान दें तो पाएंगे कि हमारा ध्यान रिड्यूस और रीयूस पर बिल्कुल नहीं है ।
हालाँकि इस स्थिति के कई कारण हो सकतें हैं, कुछ समाजशास्त्रियों की नजर में इसका मुख्य कारण उपभोगतावाद  (कंस्यूमरिस्म), और उस पर आश्रित अर्थव्यवस्था है । हमारी जिंदगियाँ, हमारी इच्छाएं, और हमारे उद्देश्य चीजों का उपभोग करने में व्यस्त है। अगला फोन, अगली शॉपिंग ट्रिप, अगली गाड़ी, बड़ा घर, नए कपड़े आदि कि चिंताओं ने हमारी चेतना पर कब्जा कर लिया है, और इस अंतहीन उपभोग का निश्चित परिणाम है कचरा । लेकिन अगर हम रिड्यूस या रियूस करने लग गए तो उपभोगतावाद  और उस पर जीवित बड़ी कंपनियों एवं अर्थव्यवस्था पर लगाम लग जाएगी, जो कि शायद कुछ लोगो के लिए असुखद होगा । शायद इसलिए सफाई का सारा ध्यान कचरे को अदृश्य  करने में लगा है, ताकि उपभोग पर कोई लगाम ना लगे,  और इस से लाभान्वित होने वाले और मुनाफा बनाते रहें । रिड्यूस और रियूस को कचरे की तरह ही अदृश्य कर दिया गया है।
अगर हमें अपनी प्रकृति, पृथ्वी, समाज और भावी पीढ़ी के हित में सोचना है तो शायद हमारी सफाई की परिभाषा को बदलना होगा । हमें कचरे की अदृश्यता से परे, कचरे के न्यूनतम उत्पादन, अधिकतम पुनरुपयोग को सफाई मान कर अपनी जीवनशैली में परिवर्तन लाने पड़ेंगे। तब शायद हम, हमारा इंदौर, हमारा देश, और हमारी पृथ्वी न.1 कहलायेंगे ।
अंकुर कपूर
(लेखक इंदौर में जन्मे और पले-बढ़े हैं, और वर्तमान में आईआईएम उदयपुर में सहायक प्रोफेसर हैं। उक्त विचार व्यक्तिगत हैं)
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