कर ही दिया “पेलवान” ने भाजपा का कांग्रेसीकरण…..गुस्ताख़ी माफ़ में नवनीत शुक्ला

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इंदौर में एकमात्र उपचुनाव सांवेर में होने जा रहा है। यह चुनाव अभी प्रारंभ ही नहीं हुआ है कि यहां पर पैसों की ऐसी गंगा बह रही है, जो पहले कभी नहीं बही। कारण यह है कि कांग्रेस से भाजपा में आए तुलसी पेलवान ने भाजपा की संस्कार और संस्कृति दोनों बदल दी है। भाजपाई भी मानने लगे हैं कि पेलवान को अच्छा-खासा माल मिला है। अभी तक सामान्य स्थिति में भी आठ करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हो चुके हैं। सबसे पहले शुद्ध घी के पांच लाख लड्डू बांटने पर लगभग तीन करोड़ रुपए से ऊपर की राशि का खर्च जोड़ा गया था, अब वहीं पूरी विधानसभा में भव्य कलश यात्रा निकाली जा रही है। कलश यात्रा को लेकर जो आंकड़े सामने दिख रहे हैं, वे बता रहे हैं कि किस प्रकार से मतदाताओं को भेड़ों की तरह प्रभावित किया जा रहा है। अब तो भाजपाई भी मानने लगे हैं कि पेलवान ने शुचिता और संस्कार की राजनीति करने के लिए अच्छी-खासी रकम ली है। अभी कलश यात्रा में दोयम दर्जे की साड़ी भी दी जा रही है जो दो सौ रुपए से कम की नहीं है। एक कलश, नारियल और लिफाफा साथ में दिया जा रहा है। ऐसी कई यात्राएं सांवेर में कोरोना महामारी को धत्ता दिखाते हुए निकाली जा रही हैं।  यहां बिना मास्क कलश यात्राएं धूम मचा रही हैं। इन यात्राओं पर तीन करोड़ रुपए के लगभग खर्च किए जा रहे हैं, वहीं हर बूथ पर बीस हजार रुपए और भोज की व्यवस्था भी पेलवान के सौजन्य से की गई है। यह सारी जानकारी भाजपाई ही गांव भर में दे रहे हैं। इसके साथ ही कांग्रेसी संस्कृति के अनुसार भाजपा के कुछ नेताओं को अच्छे-खासे लिफाफे दिए गए हैं। इनमें से कुछ ने संस्कारी होने के साथ वापस कर दिए। बाकी की जानकारी अभी सामने नहीं आई है,
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पर माना जा रहा है कि सांवेर का यह चुनाव इस बार पूरी तरह भाजपा, कांग्रेसी संस्कृति से लड़ने जा रही है। मजेदार बात यह है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों में ही इन दिनों एक समानता पूरी तरह दिखाई दे रही है, जिससे यह लगने लगा है कि अब दोनों ही पार्टियां संस्कार और संस्कृति से जुड़वा भाई की तरह बंध गई हैं। इन दोनों को इन दिनों एक-दूसरे के घर से भागी हुई या निकाली हुई को लुभाने की होड़ इस कदर मची हुई है कि जो इनके घर आए, वो सीता या फिर राम और जो इनके घर से निकल जाए, वो सूर्पणखा या रावण… और अगले कुछ दिनों में वापस आ जाएं तो फिर सीता बन रही हैं। वहीं दूसरी ओर पच्चीस साल तक भुलाते नहीं थे, वे अब उन्हें भुना रहे हैं। चुनाव के परिणामों को लेकर जब एक भाजपाई से पूछा कि हमें क्यों जीतना चाहिए तो उसने कहा कि यह चुनाव शुचिता, संस्कार और राष्ट्र के लिए नहीं, भाजपा की संस्कृति के ताबूत पर अंतिम कील लगाने के लिए हो रहा है।
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