ओपन माइक में आज राजेश राणा की कविता “परिंदो”

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परिंदो
परिंदो,
तुमने कभी शिकायत नही की ,
कि हवा जहरीली है , 
झील का पानी खारा है ,
रहने को पेड़ कम बचे है ,
अब हमारा क्या गुजारा है ।
परिंदो ,
तुमने कभी ,
चीख पुकार नही मचाई ,
अपने सगे संबंधियों की मौत पर ,
या आज के शोरगुल में ,
वो किसी को नही दी सुनाई ।
परिंदो ,
तुमने कभी खुद के अधिकारों को लेकर
नही दिए धरने ,
न की शोक सभाएं ,
न निकाली कभी रैलियां ।
परिंदो ,
तुम मरे तो बस मर गए ,
हमेशा के लिए ।
इंसानों के मरने पर ,
होती है शोक सभाएं ,
होती है संवेदनाएं ,
होती है तेरहवीं ,
होती है पगड़ी रस्म ,
होती है अन्नपंक्ति ,
और होती है एक पुण्यतिथि ;
इंसान क्यों नही मरता ऐसे ,
जैसे मरते हो तुम हमेशा के लिए ।
© राजेश “राणा”
(देश की सबसे बड़ी पक्षी त्रासदी पर)
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