गणतंत्र, अर्थतंत्र या धर्मतंत्र… विशेष सम्पादकीय …. नवनीत शुक्ला

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वि श्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का ग्रंथ लिखने वाले भारत की आज आजादी अपने आप में एक महोत्सव के रूप में मनाई जाती है। 74वें  स्वतंत्रता दिवस पर भले ही देशवासी कोरोना से परेशान है, लेकिन स्वतंत्रता दिवस का नाम आते ही देश में देशभक्ति का जज्बा और जोश उमड़ जाता है। यही बातें भारत को दूसरे देशों से अलग दिखाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अगले दो दिन देशभक्ति का उन्माद, वाट्सअप, सोशल मीडिया पर जमकर दिखाई देगा। घरों के सुने द्वारों पर भले ही तिरंगे न लहराए पर इलेक्ट्रानिक मीडिया इससे भरा होगा। दूसरी ओर देश अब अपनी नई दिशा की ओर चल पड़ा है। धर्म और राजनीति का जो तालमेल या घालमेल हो गया है, वह कई प्रश्न भी खड़े कर रहा है। हजारों साल से धर्म हमारी संस्कृति है और धार्मिकता हमारी प्रवृत्ति है। धर्मान्धता हमारी विकृति है। आग की लपटें चूल्हें में ही अच्छी लगती है, जो आदमी की भूख मिटाती है। धार्मिकता का शरीर से बाहर कोई अस्तित्व नहीं होता है। वह शरीर के हर अंग को संचालित करती है, जबकि धर्मांधता का शरीर के अंदर दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं होता है। धर्म एक अनुशासन है, जो मनुष्य को मनुष्यता के दायरे में रहने की हिदायत देता है। आदमी चाहे किसी भी धर्म का हो, अगर वह धार्मिक होता है तो गांधी बनता है और धर्मांध होता है तो हिटलर बन जाता  है। धर्म का तत्व अत्यंत निगुण भी है और सरल भी है। जैसे कि उक्ति है-  धर्मस्व तत्वं निहितं गुहायां महाजनों येन गत स पंथा 
किन्तु वर्तमान में धर्म के राजनीतिक विख्याताओं पर ख्यात नाम लेखकों का भी कटाक्ष है- आज हर एक राजनेता धर्म की एक ऐसी व्याख्या करता है जैसे वो धर्म का ज्ञाता नहीं, बल्कि धर्म का जन्मदाता बन गया है।
कोई भी देश की पहचान उसके धार्मिक आधार से नहीं, बल्कि उसके आर्थिक और सामाजिक आधार पर होती है। जिन देशों ने धार्मिक आधार पर अपनी पहचान कायम करने की कोशिश की है, उनके परिणाम पूरे विश्व को दिखाई दे रहे हैं। जिन देशों ने आर्थिक और सामाजिक आधार पर देश को आगे बढ़ाया, वे अब आगे निकल गए है।
भारत को यह तय करना होगा कि वह किस आधार पर देश को आगे ले जाना चाहता है? करोड़ों युवकों के हाथों में रोजगार हो, किसानों को उनके उत्पादन का बेहतर सम्मान मिले। इसी के साथ विश्व पटल पर देश गुणवत्ता के उत्पादन से पहचाना जाए। अरस्तु ने लिखा है – लोकतंत्र में गरीबों के पास अमीरों की तुलना में अधिक शक्ति होती है, क्योंकि वे संख्या में बहुत अधिक होते हैं और भविष्य में हर लोकतंत्र को बहुमत की इच्छा सर्वोपरि होगी। देश को उस दिन आजादी का सबसे श्रेष्ठ महोत्सव कहा जाएगा, जब हम धर्म आधारित राजनीति की बजाय अर्थ आधारित राजनीति से देश को बेहतर भविष्य की ओर ले जाएंगे। एक बार फिर लोकल इंदौर के सभी सुधि पाठकों / सहयोगियों को स्वतंत्रता दिवस की बधाई। कोरोना महामारी से संघर्ष में एक दूसरे का हाथ थामिए, खुद भी बचिए और देश को भी बचाइए।
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