चलो, कोई तो निकला, जिसकी रीढ़ में हड्डी है और मूंछें हैं… गुस्ताख़ी माफ में नवनीत शुक्ला

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Pपिछले पांच दिनों से शहर में श्रीमंत ज्योतिरादित्य सिंधिया यानी ज्योति बाबू के आगमन को लेकर कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए नेताओं ने अपनी तैयारी की थी तो भाजपा ने भी स्वागत की औपचारिकता में कोई कमी न रहे, इसका पूरा ध्यान रखा। जानकार जानते हैं कि भविष्य का चुनाव भाजपा का ज्योति बाबू के नेतृत्व में ही होगा, परंतु वर्तमान परिवेश में सिंधिया के भाजपा में आगमन पर मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री और फिर उनके संत्री जिस तरीके से अपनी पलकें और पावड़े सेनेटाइज कर स्वागत के लिए गिर-गिर पड़ रहे थे, ऐसे में भिया (कैलाश विजयवर्गीय) का अंतर्ध्यान हो जाना यह बता रहा था कि टाइगर अभी जिंदा है। वे अपने दायित्व के लिए स्वागत छोड़ अपनी कर्मभूमि बंगाल में ममता दीदी से दो-दो हाथ करने के लिए पहुंचे थे। हालांकि वे चाहते तो नहीं भी जाते, क्योंकि जो विरोध उनको करना था, वह दो दिन बाद भी कर सकते थे। इंदौर में उन्होंने सिंधिया के स्वागत के लिए न रहते हुए अपनी कूटनीतिक सियासत का जो कौशल दिखाया है, वह उनके नैसर्गिक स्वभाव को भी दर्शाता है। अब कांग्रेसी और भाजपाई इसे वैचारिक अंतर्द्वंद्व मानें या राजनीतिक रणनीति मानें, यह उन्होंने उन पर ही छोड़ दिया है।  अगर ज्योति बाबू की बात करते हैं तो उन्होंने कांग्रेस इसलिए छोड़ी कि उन्हें मान-सम्मान नहीं मिल रहा था। इसी मान-सम्मान की तलाश में उन्होंने सरकार गिरा दी। अब भाजपा में शामिल होने के बाद उन्हें यह भी याद आ रहा होगा कि भिया ने कई सभाओं में दावा किया था कि शिवराज के घुटने के बराबर भी कद नहीं है सिंधिया का। अब उन्हें अपने स्वार्थ के लिए उनके द्वार जाना पड़ रहा है, जिनसे कई मोर्चों पर दो-दो हाथ हो चुके हैं। अपन यूं भी कहें तो कई जख्म हरे हैं और कई जख्म कोशिश के बाद भी नहीं भरे हैं। भाजपा की ही एक बड़ा भाग, जो लंबे समय से सिंधिया और सिंधिया समर्थकों से दो-दो हाथ कर रहा है, वह इस स्वागत प्रसंग से खुश नहीं है। साथ ही उन्होंने यह भी बता दिया कि वे राष्ट्रीय परिधि के नेता भी हैं। उनके लिए सिंधिया का कद कोई मायने नहीं रखता है।
सिंधिया और दयालु एक ही केडर के नेता…
सिंधिया के लिए उनके कैडर के ही नेता दादा दयालू हों या बल्लेबाज विधायक आकाश विजयवर्गीय या फिर हरिनारायण यादव, इसमें पेलवान को भी जोड़ लेते हैं, यही स्वागत कर भजन-भोजन करवा सकते हैं। वैसे भी विजयवर्गीय के घर भोजन-भंडारे की कोई कमी शुरू से नहीं है। उनके इस कदम में कई अर्थों का संदेश भी छिपा हुआ है। कहने वाले कह रहे हैं कि उन्होंने बिना कहे यह कह दिया कि सिंधिया समर्थकों को लेकर चल रहा शक्ति परीक्षण उनके स्वभाव के विपरीत है। उन्होंने अपना कुछ खोया है। इसकी भरपाई सिंधिया के भाजपा में आने से नहीं हो सकती। रहा प्रश्न कद का तो 1983 में पार्षद के चुनाव के बाद 1990 में विधायक, फिर मंत्री, फिर महापौर, यानी ऐसा कोई घाट नहीं बचा, जहां पर उनका जाल नहीं फैला हो। साथ ही उन्होंने यह भी सिद्ध कर दिया कि किसी के आने-जाने से उनके नैसर्गिक स्वभाव में या उनके मिजाज में कोई परिवर्तन नहीं आता। वे मौसम के अनुरूप स्वभाव नहीं बदलते। जानने वाले बता रहे हैं कि शिवराज कैबिनेट में भी दो ही मंत्री ऐसे थे, जो शिवराज को बैठक में भी और बैठक के बाहर भी शिवराज कहकर ही बुलाते थे। इसमें ग्वालियर अंचल के नेता अनूप मिश्रा और मालवा अंचल के नेता कैलाश विजयवर्गीय ही हैं। अब यह भी समझ लिया जाए कि कैलाश विजयवर्गीय का भविष्य ज्योति बाबू पर आश्रित नहीं है, परंतु उनके पांच सिपहसालारों का भविष्य भिया के हाथों में टिका हुआ है। अब यह भी बता दें कि यह माद्दा आर.के. स्टूडियो की फिलिम में ही हो सकता है, जिसका एक उदाहरण ताई एक चुनाव में देख चुकी हैं कि दादा दयालू की एक लाख वोटों की बढ़त रातोंरात दो नंबर में दो सौ पचास वोट पर आकर टिक गई। यानि सब मिलकर बोलो- राम-नाम सत्त है, सत्त बोलो गत्त है।
मोघे का कोई भविष्य नहीं…
शहर को खुलवाने के लिए गिर गिर पड़ रहे भाजपा के वरिष्ठ नेता मोघे जी महाराज इन दिनों शहर खुलने के बाद अंतरध्यान हो गये हैं। शहर खुलवाने की जवाबदारी मोघे और लालवानी के हाथों में ही थी और उन्होंने पूरी ताकत लगवाकर शहर तो खुलवा दिया अब धड़ल्ले से कोरोना मरीजों की संख्या बढ़ने के बाद दोनों ही नेता शहर से नदारत हो गये हैं। अब इस बिमारी का ठीकरा कलेक्टर पर फोड़ने के लिए इशारे भी कर रहे हैं। परंतु विद्वान नेता यह बताने को तैयार नहीं है कि उनके पास कोई वीजन इस बिमारी से मुक्त होने का है या नहीं है। इस मामले में भाजपा के एक बड़े नेता ने दावा किया कि मोघे जी का अब राजनीति में कोई भविष्य नहीं है। कई दिग्गज घर बैठ गये हैं। मोघे जी भी इस चुनाव के बाद घर पर ही दिखेंगे।
मोहन यादव गले मिले या गले पड़ गए…
दो दिन पूर्व प्रदेश के मंत्री मोहन यादव के इंदौर आगमन पर गुलशन यादव ने उनके स्वागत में एक होटल में कार्यक्रम रखा था जिसमें उनके साथ गले मिलने से लेकर गलबहिया तक खूब हुई, जबकि मोहन यादव चार दिन पहले से ही कोरोना पॉजिटिव की जांच रिपोर्ट का इंतजार कर रहे थे। कुल मिलाकर यादव समाज के 8 से अधिक दिग्गज अब कोरोना महामारी को लेकर मुसीबत में आ गए है। इसमें नींबू पेलवान, हरिनारायण यादव, रमेश उस्ताद, दीपू यादव, सदाशिव यादव प्रमुख है। सभी को अगले 10 दिनों के लिए होम क्वारेंटाइन किए जाने को लेकर निर्देश दिए गए है। अब बाहर दिखे तो आप जानो…
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