नहाय खाय से होगा छठ के महापर्व का महा-आगाज़: जानें इस पर्व का महत्व और सही विधि

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छठ पूजा मुख्य रूप से सूर्य देव को समर्पित होती है। हिंदू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बताया जाता है कि छठ मैया सूर्य देवता की बहन हैं। ऐसे में इस दौरान अर्थात छठ पूजा के दौरान सूर्य देव की पूजा करने से छठ मैया की प्रसन्नता हासिल होती है, जिससे व्यक्ति के घर में सुख और शांति, धनसंपदा बनी रहती है।

छठ पर्व शुभ मुहूर्त
जैसे नवरात्रि का त्योहार 9 दिनों तक मनाया जाता है वैसे ही छठ का यह पर्व 4 दिनों तक मनाया जाता है। इसका पहला दिन नहाय खाय के नाम से जाना जाता है, दूसरा दिन खरना के नाम से जाना जाता है, तीसरे दिन छठ मैया का प्रसाद बनाया जाता है और सूर्य देवता को संध्या अर्घ्य दिया जाता है और चौथे यानी सप्तमी के दिन सूर्य देवता को दोबारा जल चढ़ाकर उनकी पूजा की जाती है और इस दिन छठ पूजा संपन्न होती है।

छठ पूजा: संध्या अर्घ्य समय
10 नवंबर, 2021 (बुधवार)

10 नवंबर (संध्या अर्घ्य) सूर्यास्त का समय :17:30:16

11 नवंबर (उषा अर्घ्य) सूर्योदय का समय :06:40:10

नहाए खाए से शुरू होगा छठ का यह महापर्व
छठ पूजा का पहला दिन नहाय खाय (08 नवंबर 2021) के नाम से जाना जाता है। नहाए खाए कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन मनाया जाता है। इस दिन व्रत रहने वाले लोग स्नान करने के बाद नए कपड़े पहनते हैं और शाकाहारी भोजन करते हैं। व्रत करने वाला व्यक्ति जब भोजन कर लेता है, उसके बाद ही घर के अन्य लोग भोजन करते हैं।

छठ पूजा का दूसरा दिन यानी कार्तिक शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि खरना (09 नवंबर 2021) के नाम से जानी जाती है। इस पूरे दिन व्रत किया जाता है और शाम के समय व्रत करने वाले लोग भोजन ग्रहण करते हैं। इस दिन का व्रत बेहद ही कठिन होता है क्योंकि इस दिन ना ही अन्न और ना ही जल ग्रहण किया जाता है। शाम के समय चावल और गुड़ से खीर बनाई जाती है और उसे खाया जाता है। बता दें कि, इस दिन नमक का उपयोग वर्जित होता है। इसके अलावा इस दिन चावल का पिठ्ठा और घी लगी रोटी भी प्रसाद के रूप में बांटी जाती है।

छठ पूजा का तीसरा दिन यानी कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को छठ पूजा का मुख्य दिन (10 नवंबर 2021)कहा जाता है। इस दिन प्रसाद बनाया जाता है जिसे ठेकुआ कहते हैं। इसके अलावा इस दिन चावल के लड्डू भी बनाए जाते हैं। इसके बाद सभी प्रसादों और फलों को एक बांस की टोकरी में सजाया जाता है। व्रत करने वाला इंसान इस टोकरी को लेकर किसी तालाब, नदी, या घाट के किनारे जाकर सूर्य देवता को अर्घ्य देता है। इस दिन डूबते सूर्य की पूजा की जाती है।

इसके बाद अगले दिन यानि की (11 नवंबर 2021) कार्तिक शुक्ल पक्ष की सप्तमी के दिन सुबह सूर्योदय के समय बीते दिन की सूर्यास्त वाली पूजा की प्रक्रिया को दोहराया जाता है। इसके बाद पूजा करने के बाद प्रसाद बांटा जाता है और इसके बाद ही छठ पूजा संपन्न मानी जाती है।

छठ पूजा आवश्यक सामग्री
नए वस्त्र, बांस की दो बड़ी टोकरी या सूप, बांस या फिर पीतल के सूप, दूध, जल, गिलास, लोटा, थाली, पत्ते लगे गन्ने, पानी वाला नारियल, चावल, सिंदूर, दीपक, धूप, अदरक का हरा पौधा, हल्दी, मूली, मीठा नींबू, शरीफा, केला, नाशपाती, शकरकंदी, सुथनी, पान, सुपारी, शहद, कुमकुम, चंदन, अगरबत्ती, धूप बत्ती, कपूर, मिठाई, गुड़, चावल का आटा, गेहूं।

छठ पूजा की सही पूजन विधि
बांस की तीन बड़ी टोकरी या बास या पीतल के तीन खाली सूप, थाली, दूध और गिलास ले लें।
इनमें चावल, लाल सिंदूर, दीपक, नारियल, हल्दी, गन्ना, सुथनी, सब्जी और शकरकंदी रखें।
फलों में नाशपाती, बड़ा नींबू, शहद, पान, साबुत, सुपारी, कैराव, कपूर, चंदन, और मिठाई भी रखें।
प्रसाद के रूप में ठेकुआ, मालपुआ, खीर, पूरी, सूजी का हलवा, चावल से बने लड्डू, भी इनमें रखें।
इन सामग्रियों को टोकरी में रख लें। सूर्य को अर्घ्य देते समय सारा प्रसाद सूप में रखें और सूप में ही दीपक जला लें। इसके बाद नदी में उतर कर सूर्य देवता को अर्घ्य दें।
छठ पूजा नियम
हमेशा साफ़-सुथरे और मुमकिन हो तो नए कपड़े पहनकर ही छठ पूजा करें।
छठ पर्व के दौरान (नहाय-खाय से छठ के समापन तक) व्रती व्यक्ति को बिस्तर पर सोने की मनाही होती है।
इस दौरान सात्विक भोजन ही करें, और भूल से भी शराब आदि का सेवन न करें।
साफ़-सफाई का विशेष ध्यान रखें और कुछ भी गंदा या ख़राब न करें।

छठ पूजा 2021: क्या करें क्या न करें छठ पूजा में क्या करें:

इस दौरान जितना हो सके ज़रुरतमंदों की मदद करें और उनकी ज़रूरत का सामान उन्हें दान करें।
किसी ज़रूरत को यदि आप छठ पूजा का सामान दिलवाकर छठ पूजा करने में उनकी मदद करते हैं तो इसे भी बेहद ही शुभ और फलदायी माना गया है।
व्रत करने वाली महिलाओं की जितनी हो सके सेवा करें। उन्हें गलती से भी नाराज़ न करें। छठ का व्रत करने वाली महिलाओं पर छठी मैया की प्रसन्नता बनी रहती है, ऐसे में उनकी सेवा करने से आपको भी उनके व्रत का शुभ परिणाम और छठी मैया का आशीर्वाद मिलेगा।
पूजा के लिए बांस के ही सूप का उपयोग करने की सलाह दी जाती है। इसी सूप में ही पूजन सामग्री रखें और इसमें एक दीपक भी अवश्य जलाएं।जितना ज्यादा आपके लिए मुमकिन हो छठ का प्रसाद बनाएं और इसे और लोगों में बांटे।
छठ पूजा में क्या न करें

बिना नहाये कोई भी पूजन सामग्री को हाथ न लगायें।
प्रसाद बनाने के दौरान भूल से भी नमकीन वस्तुओं को हाथ न लगायें।
छठी मैया के प्रसाद को गलती से भी पैर न लगायें। इससे आपको छठ माता के प्रकोप को झेलना पड़ सकता है।
छठ मैया से यदि कोई मनौती मांगी हो तो उसे गलती से भी भूलें नहीं।
चांदी, स्टील, प्लास्टिक, शीशे के बर्तन से भूल कर भी सूर्य देवता को अर्घ्य न दें।

छठ पूजा 2021: क्यों, कब और कैसे?
छठ पूजा को बहुत सी जगहों पर डाला छठ, छठी माई, छठ, छठ माई पूजा, सूर्य षष्ठी पूजा इत्यादि नामों से जाना जाता है। यह पर्व साल में दो बार मुख्य रूप से मनाया जाता है। एक बार चैत्र शुक्ल षष्ठी को और दूसरा कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि पर। यूं तो दोनों ही छठ पूजा का बेहद महत्व बताया गया है लेकिन इनमें से कार्तिक शुक्ल के महीने में पड़ने वाली छठ को मुख्य माना जाता है।

छठ पूजा मुख्य तौर पर सूर्य देव को समर्पित होती है। ऐसे में यह व्रत, यह पूजा भगवान सूर्य की प्रसन्नता हासिल करने और उनकी कृपा अपने जीवन में बनाए रखने के लिए की जाती है। सूर्य देव की नियमित रूप से पूजा करने से व्यक्ति का स्वास्थ्य उत्तम बना रहता है और साथ ही व्यक्ति के धन-धान्य का भंडार भरा रहता है। इसके अलावा छठी मैया जो सूर्य देवता की बहन बताई गई हैं उनकी पूजा करने से व्यक्ति को संतान प्राप्ति भी होती है। ऐसे में श्रेष्ठ संतान पाने के लिए भी यह व्रत रखा जाता है। इसके अलावा यह व्रत सभी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए जाना जाता है।

षष्ठी देवी कौन हैं और कैसे हुई इनकी उत्पत्ति?
छठ देवी को सूर्य देव की बहन बताया जाता है। हालांकि छठ व्रत की कथा के अनुसार बात करें तो छठी देवी को ईश्वर की पुत्री देवसेना के रूप में वर्णित किया गया है। देवसेना अपने रूप का परिचय देते हुए कहती हैं कि, ‘वह प्रकृति की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न हुई है और यही वजह है कि उन्हें षष्ठी कहा जाता है। इसके अलावा संतान प्राप्ति की चाह रखने वालों को भी छठी मैया की विधिवत पूजा करने की सलाह दी जाती है।

कहा जाता है माता सीता ने प्रभु श्री राम के अयोध्या आने के बाद कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्य पूजा की थी। इसके अलावा महाभारत काल में कुंती ने भी सूर्य पूजा से ही पुत्र की प्राप्ति हुई थी। कहा जाता है कि अविवाहित कुंती ने कर्ण को जन्म देने के बाद उन्हें नदी में प्रवाहित कर दिया था। कर्ण सूर्य देव के उपासक थे, वह घंटो घंटो जल में रहकर सूर्य की पूजा किया करते थे और यही वजह है कि कर्ण पर सूर्य देव की कृपा हमेशा बनी रही। ऐसे में लोग आज भी सूर्य देव की कृपा प्राप्त करने के लिए कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन सूर्य पूजा करते हैं।

प्रस्तुति : गुरु महेश जैन
इंटरनेशनल जोतिषाचार्य
राणापुर जिला झाबुआ मध्यप्रदेश

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