INDORE POLITICS : इंदौर को क्या इसलिए चाहिए था लालवानी जैसा नेता!

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इंदौर को  राजनीति की  पाठशाला कहा  जाता है , होमी  एफ.  दाजी   से   लेकर  प्रकाश चंद्र सेठी और   सुमित्रा  महाजन  जैसी शख्सियत को इंदौर  ने अपने प्रतिनिधि  के रूप में चुन  कर संसद में भेजा है ।  प्रकाश चंद्र सेठी देश के गृहमन्त्री  और सुमित्रा महाजन ने राज्य मंत्री और लोकसभा  स्पीकर  पद रह कर यह साबित किया कि  इंदौर  का सांसद  साक्षर ही नहीं समझदार भी है और अपने  पद की गरिमा और मान -सम्मान को भी, जनता का मान सम्मान -मान  कर  उसके साथ गरिमामय  आचरण  निभाहता है।  इन्होने भूल कर भी ऐसी  कोई भूल  नहीं की जिसके कारण इंदौर को  जगहसाई का अपमान सहना पड़ा हो । लेकिन इस बार  इंदौर  ने जिस सांसद को चुना उसने एक बार नहीं अनेक बार इंदौर के नाम के अनुरूप अपने  सांसद की भूमिका नहीं निभाई और वे मीडिया में उपहास के पात्र बनते रहे । 

इंदौर की राजनीति के हर दौर में कोई न कोई ऐसा नेता जरूर हुआ है, जिसे उद्घाटन, भाषण और हर मंच पर बैठने का शौक होता है। कांग्रेस के राज के भी ऐसे कई नेताओं के नाम गिनाए जा सकते हैं, जो ऐसे काम में सिद्धहस्थ रहे थे। अब इंदौर में ये काम सांसद शंकर लालवानी के पास है। वे सुबह से शाम तक फीते काटने, मीटिंग में भाग लेने या भाषण देने में ही व्यस्त रहते हैं। कोरोनाकाल से उन्होंने जो काम शुरू किया था, वो आज भी जारी है। वास्तव में ये उनका शौक नहीं है, मीडिया में छाये रहने का एक अंदाज है। शहर में जहाँ सरकारी या भाजपा का कोई आयोजन होता है, सांसद वहीं नजर आते हैं।कई ऐसे आयोजन जो नितांत सरकारी होते हैं, पर लालवानी वहाँ भी मंच पर दिखाई देते हैं। वे सिर्फ मंच पर दिखाई ही नहीं देते, भाषण भी जमकर देते हैं, पर कई बार उनकी जुबान फिसल जाती है। पिछले सालभर में ऐसे कई मामले गिनाए जा सकते हैं, जिनमें उन्होंने मुद्दे से हटकर बोला और बाद में उनकी खिल्ली भी उड़ी।
अपने ज्ञान और अपने कामकाज को दिखाने के लिए लालायित सांसद शंकर लालवानी कई बार ऐसी गलतियां भी कर जाते हैं, जो कभी उन पर तो कभी पार्टी पर भारी पड़ जाती है। पहले भी वे अलग सिंधी राज्य की मांग कर बड़ा बखेड़ा कर चुके हैं। इसका कारण है कि वे बिना होमवर्क के सीधे मंच पर पहुँच जाते हैं। नेताजी सुभाषचंद्र बोस की शनिवार को जयंती थी, इस मौके पर इंदौर नगर निगम ने एक कार्यक्रम आयोजित किया। इसमें सांसद ने बतौर अतिथि पहुंचे, यहां वे नेताजी की टोपी धारण करके मंच पर पहुंचे। जब उनके संबोधन की बारी आई, तो लालवानी की जुबान फिसल गई। नेताजी के जयंती समारोह में जहां-जहां उन्हें सुभाषचंद्र बोस का जिक्र करना था, वहां उन्होंने चन्द्रशेखर आजाद का नाम लिया! एक बार तो उन्होंने चंद्रशेखर बोस तक कह डाला।
दरअसल, राजनीति का पहला पाठ है, मीडिया में अपने आपको बनाए रखना। लगता है, इस काम में सांसद शंकर लालवानी का आज तो कोई जोड़ नहीं! शायद उन्हें किसी ने सलाह दी है, कि लोगों को अपनी सक्रियता दिखाना है, तो चाहे जैसे हो ख़बरों में बने रहो! कोरोनाकाल के बाद जब से स्थिति थोड़ी सामान्य हुई है, ऐसी कोई मीटिंग नहीं हुई जिसमें सांसद ने अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराई हो! अब ये स्थिति है कि कभी वे कचरा गाड़ी का स्टेरिंग थाम लेते हैं, तो कभी किसी अभियान की झंडी हिलाने लगते हैं। वे कोई सरकारी मीटिंग भी नहीं छोड़ते! वे राजस्व विभाग की मीटिंग में पहुंचकर भी भाषण देने लगते हैं।
सांसद शंकर लालवानी ने लोकसभा में अलग सिंधी राज्य की मांग उठाकर देशभर में बवाल कर दिया था। उन्होंने लोकसभा में अपनी बात भी सिंधी में रखी थी! ये जानते हुए कि लोकसभा में वे अकेले सिंधी सांसद हैं और उनकी बात को समझने वाला और कोई नहीं है! उनकी इस मांग के पक्ष में न तो भाजपा खड़ी हुई और न सिंधी समाज! क्योंकि, इस मांग का कोई तार्किक आधार नहीं था। इंदौर के सिंधी समुदाय ने भी इसका विरोध किया! क्योंकि, आज तक किसी सिंधी नेता ने ऐसी कोई बात नहीं की! बाद में उन्होंने अपनी मांग पर लीपा-पोती करने की कोशिश की। सिंधी समुदाय के संरक्षण के लिए अलग सिंध प्रदेश का गठन करने के साथ ही उन्होंने लोकसभा में सिंधी कल्याण बोर्ड बनाने, राष्ट्रीय सिंधी अकादमी के गठन, सिंधी टीवी और रेडियो चैनल शुरू करने की मांग भी की थी। साथ ही 26 जनवरी की परेड में सिंधी समुदाय की झांकी को भी शामिल किए जाने की मांग की, लेकिन उनकी किसी मांग को गंभीरता से नहीं लिया गया। इनमें कुछ मांगे तो ठीक कही जा सकती है, पर ज्यादातर मांगे उचित नहीं कही जा सकती।

 

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