क्या हो गया आपको… कुलपति से हेडमाट साब हो गए…गुस्ताखी माफ़ ….नवनीत शुक्ला

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क्या हो गया आपको… कुलपति से हेडमाट साब हो गए…
दो दिन पूर्व एक संवाद पार्टी में कैसे राजनीति हो, इस पर भंवर में फंसे कृष्ण के साथ हुआ। इस दौरान उन्हें उनका विराट रूप दिखाते हुए बताया कि विश्वविद्यालय के कुलपति को पांचवीं के स्कूल का हेडमास्टर बना दिया है। यह क्या हो रहा है और इसके बाद फिर उन्हें सब याद आने लगा। उन्हें याद आया कि पटवारी के कार्यकाल में संभागीय संगठन मंत्री होकर वे यह तय करते थे कि शिवराज कहां से लड़ेंगे, कैलाश कहां से लड़ेंगे और नरेंद्र कहां जाएंगे। इसके पूर्व संगठन मंत्री को भाईसाहब कहने की परंपरा रही थी। इस परंपरा को तोड़ते हुए संगठन मंत्री को साहब करने की परंपरा उन्होंने ही चालू की थी, जो यह तय करते थे कि कम से कम आठ विधानसभा को कौन से मंत्री देखेंगे। उनकी यह हालत हो गई है कि वे एक विधानसभा देखने लायक हो गए हैं। अपनी इस हालत पर उन्हें तरस भी आया, पर उनको यह भी याद आया कि अभी पार्टी की ऐसी हवा चल रही है कि आडवाणी और जोशी जैसे लोग हजार-पांच सौ के नोट में बदल गए यानी चलन में नहीं रहेंगे, परंतु  समाप्त भी नहीं होंगे। पार्टी अपने तमाम पुराने नेताओं को और साठ साल से ऊपर जा चुके नेताओं को जिस तरह दौड़ा-दौड़ाकर समाप्त कर रही है, उसके बाद उन्हें यह समझ में आया कि जो काम मिल रहा है, ले लिया जाए, वरना उनकी हालत भी घर बैठे उन नेताओं जैसी हो जाएगी, जो अब न घर के रहे हैं और न घाट के, क्योंकि सारा जीवन उन्होंने पार्टी को खड़ा करने के लिए लगा दिया था। दूसरा कोई काम उन्हें आता नहीं। ऐसे में जो दे दे उसका भी भला और जो न दे, उसका भी भला।
महामंत्री को लेकर मची हुई है घमासान….
भाजपा नगर अध्यक्ष गौरव रणदिवे के सामने अब महामंत्री नियुक्त करने को लेकर भारी घमासान मच चुका है। इस पद के लिए एक अनार सौ बीमार जैसी हालत हो गई है। अनार के एक दाने पर कई लोग अपनी ताकत लगा रहे है। इस नियुक्ति के लिए दिल्ली से लेकर भोपाल और मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री तक अपने नाम दे रहे है। यही जूतमपैजार अगर रही तो यह मान लिजिए कि अगले कुछ महीने इंदौर में ईकाई का गठन नहीं होगा क्योंकि इसके बाद कई इस्तीफे भी होने वाले है। फिलहाल  गोलू शुक्ला, सुमित मिश्रा, बबलू शर्मा, गंगा पांडे, मनोज मिश्रा, महेश पालीवाल और संदीप दुबे, कमल वाघेला, हरप्रीत सिंह बक्शी, नानूराम कुमावत भी दावेदार है और सभी 10 हाथियों की ताकत अभी तो रख रहे है।
लाखों से हारे मजे में हजारों से हारे खुद से हार गए…
दो दिन पूर्व धूमधड़ाके के साथ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और कांग्रेस से भाजपा में गए वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया अंतत: राज्यसभा के सदस्य बन ही गए। बनने के बाद कांग्रेसियों का दर्द तो सामने आया ही, भाजपाइयों का दर्द भी कांग्रेसियों से कम नहीं दिखा। जहां कांग्रेसियों का दर्द यह था कि एक भिया सवा लाख से हारे तो दूसरे भिया सवा तीन लाख से हारे। हार के रिकार्ड बना दिए। सालभर भी घर बैठते नहीं बना। उनकी नहीं सोची, जो इन्हीं नेताओं के कारण घर बैठ गए हैं। कांग्रेसियों का कहना यह है कि पूरा जीवन पार्टी को समर्पित रहे एक चुनाव भी हार जाओ तो अगली बार इन्हीं नेताओं के दरवाजों पर कई दिन सफाई देना पड़ती है। बताना पड़ता है कि क्यों हारे, उसके बाद भी कोई वापसी की संभावना नहीं रहती। ऐसे कई नेता हैं, जो हजारों से हारे और घर बैठ गए। ऐसे भी कई नेता हैं, जो लहर में जीते और इस बार घर बैठ गए। उनमें से किसी को नहीं पूछा… तो दूसरा दर्द भाजपाइयों का है। उनका कहना है प्रभात झा, कैलाश विजयवर्गीय सहित कई ऐसे नेता रहे, जो पार्टी के लिए समर्पित रहे, परंतु जब उनकी बारी आने वाली थी, तो राजा-रजवाड़ों के चक्कर में मुट्ठी भर नेताओं ने अपना भला करने के लिए सरकार बना ली। यदि पांच साल भाजपा विपक्ष में बैठती तो और ज्यादा ताकत से आती। नए युवाओं को मौका मिलता और एक बार फिर उन्हें ही मौका मिलेगा, जो पिछली बार भी मौकेबाज थे।

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