क्या सही में मेंदोला को मंत्री बनाया जाएगा ! ….गुस्ताखी माफ़ में नवनीत शुक्ला

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भाजपाई कहारो के भरोसे बनी सरकार में एक बार फिर इंदौर के सर्वाधिक मतों से जीते विधायक यानि दादा दयालु क्या वाकई मंत्री बनेंगे। क्योंकि पुराने अनुभव बता रहे है कि हमेशा उनका उपयोग पार्टी में कड़ी पत्ते की तरह होता रहता है। सब्जी पकने के बाद कड़ीपत्ते को बाहर निकाल दिया जाता है। कुछ ऐसा ही हर बार दादा दयालु के साथ हो रहा है। दूसरी ओर फिर मंत्रिमंडल का विस्तार होना है और इस पर अभी ग्रहण लगा हुआ है। अपनी परंपरागत शैली के अनुसार मुख्यमंत्री इसे अभी 6 महीने और लटकाकर रख सकते है। इससे सिंधिया के खास सिपहसालार भी शिवराज के भरोसे ही रहेंगे। दूसरी ओर केवल चार मंत्रियों की जगह खाली है और इसमें से तीन मंत्री तो पहले से ही बुक है। एक पद के लिए महाभारत मचेगी ऐसे में फिलहाल विस्तार संभव नहीं है। दूसरी ओर इंदौर से अब केवल सिलावट ही पिछली बार की तरह मंत्री बनेंगे। इंदौर पर भारी माफ करना प्रभारी तो वह पहले से ही थे। ऐसे में दादा दयालु का नंबर आएगा या नहीं इस पर भी शहर में अच्छी खासी चर्चा है। कुछ कह रहे है दादा और भिया के रिश्ते रियासत और सियासत में ठीक नहीं रहे है। ऐसे में इस बार भी उन्हें धैर्य रखना होगा। वैसे भी जानकार कहते है कि दादा का असली नाम धैर्यशीलराव ही है। हमारी प्रार्थना है कि वे एक बार मंत्री बन जाए।
दूध के दांत टूटे नहीं महापौर का ख्वाब…
दो महीने बाद नगरीय निकाय चुनाव को लेकर भाजपा में अभी से बिसात बिछना शुरू हो गई है। मजेदार बात यह है कि जिन लोगों की उम्र राजनीति के हिसाब से दूध के दांत टूटने के भी नहीं है वे महापौर के ख्वाब देख रहे है। दूसरी ओर उम्रदराज हो चुके कई नेता अब सेवानिवृत्ति की दहलीज पर पहुंचने वाले है यानि 55 से 60 के बीच झूल रहे है। ऐसे नेता या तो मनोनीत पार्षद की जुगाड़ में हाथ-पांव चला रहे है या फिर पार्षद लड़कर एमआईसी के ख्वाब देख रहे है। जिनके दूध के दांत नहीं गिरे वे पार्टी में इन दिनों नए समीकरण बैठाने की कोशिश कर रहे है। हालांकि जानकार कह रहे है कि सारे समीकरण धरे रह जाएंगे एक बार फिर शंकर लालवानी ही महापौर का टिकिट ले आएंगे। जोड़ जुगाड़ में वे पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं पर भारी पड़ते है। इसे अब कार्यकर्ताओं ने भी समझ लिया है। वे मान रहे है कि भाजपा में भाग्य बड़ी चीज है। (इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। ‘लोकल इंदौर ‘ इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेता  है।)
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