तब वाह कलेक्टर ,अब ठीकरा कलेक्टर के नाम … गुस्ताख़ी माफ में नवनीतशुक्ला

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मीठे के लिए कूदते रहे, बीमारी
फैलने का कारण अब कलेक्टर….
मीठा खाने के लिए जो नेता दिनभर रेसीडेंसी कोठी और व्यापारियों के बीच राजनीति करते थे अब जब कड़वा  दिखने लगा तो सभी नेता नदारद हो गए। अब बीमारी का ठिकरा जिला प्रशासन पर जब फूटने की स्थिति बन रही है तो नेता फूट लिए। शहर तो खुल गया है पर डॉक्टर मान रहे हैं कि कोरोना मरीजों की संख्या में अब 15 अगस्त के बाद अच्छा-खासा धमाका दिखाई देने लगेगा। अब मरीजों को रोकने की कुबत ना प्रशासन में है ना नेताओं में। अब नेता खुद ही कोरोना की चपेट में आना शुरू हो गए हैं। नेता सक्षम हैं, खर्चे सरकार उठा लेगी, परन्तु इस महामारी की चपेट में सड़कों पर काम करने वाले छोटे कारोबारी तेजी से प्रभावित होंगे। इसमें सब्जी से लेकर ठेले और भीड़ भरे व्यापार में कोरोना मरीज एक दिन में 30 से अधिक लोगों को इस बीमारी में उलझा लेगा। डॉक्टरों का यह भी दावा है कि शहर खोलने के बाद अब बीमारी तेजी से गाँव की तरफ जाने वाली है। प्रशासन के हाथ में कुछ भी बचा नहीं है। केवल बड़ी तादाद में आने वाले मरीजों को लेकर बड़ी रणनीति बनाना होगी। कारण यह है कि नेता अपनी राजनीति कर इस शहर को भगवान भरोसे छोड़ने के बाद उप चुनाव की तैयारियों में लग गए हैं। मात्र  10 दिन में ही मरीजों की संख्या 200 से ऊपर पहुंच चुकी है जो अगले सात दिनों में 300 से ऊपर जाने लग जाएगी।  जो नेता शहर को खुलवाने के लिए बड़ी-बड़ी बाते कर रहे थे अब वे शहर को लावारिस छोड़कर अपने कामों में लग गए हैं। एक भी नेता के बाद तेजी से बढ़ रहे मरीजों को लेकर कोई योजना नहीं है। शहर के प्रभारी मंत्री की स्थिति तो और भी दयनीय है कि वे खुद ही कोरोना मरीज बनकर सांवेर में लड्डू बंटवा रहे हैं। कोई भी राजनेता मरीजों की बढ़ती संख्या को लेकर चिंतित नहीं दिखाई दे रहा है। वैसे भी अब शहर बेकाबू हुआ तो ठीकरा जिला प्रशासन पर ही फोड़ना है कि कलेक्टर फेल हो गए, हमने तो शहर को बचाने के लिए कई जतन किए थे। आज भी शहर में 20 प्रतिशत से ज्यादा लोग बिना मास्क के सड़कों पर घुम रहे हैं। यही इस बीमारी के सबसे बड़े संवाहक बनकर काम कर रहे हैं। कई राजनेता भी सड़कों पर मास्क दाड़ी पर लगाए घुमते हुए देखे जा सकते हैं।
तुम करो तो रासलीला, हमारे लिए केरेक्टर ढीला…
भाजपा के नए पेलवान इन दिनों सांवेर में लड्डू बांट चुके हैं। जिन्होंने खाया, उन्हें नमक अदा करने की चिंता इसलिए नहीं है कि लड्डू में नमक का कोई मामला नहीं था। दूसरी ओर लड्डू के जवाब में कांग्रेस की नेत्री अर्चना जायसवाल गंगा जल लेकर कूद पड़ी हैं। पेलवान के लड्डू का गणित जोड़कर कांग्रेसियों ने एक करोड़ चार लाख रुपए का हिसाब थमा दिया था तो वहीं अब भाजपाइयों ने गंगा जल का हिसाब निकाल लिया। उनके अनुसार भी एक बोतल गंगा जल कम से कम पचास रुपए की हो रही है। ऐसे में एक विधानसभा क्षेत्र में पांच हजार भी बांटी गई तो ढाई लाख रुपए का खर्च होगा। यानि सत्ताईस विधानसभा के लिए पचहत्तर लाख रुपए कम से कम खर्च होंगे। यदि कांग्रेसी अपनी संस्कृति छोड़कर ईमानदारी से गंगा जल भरेंगे तो। यदि गंगा जल में दूसरे जल की मिलावट जैसी अभी भाजपा में कांग्रेसियों की चल रही है, अगर ऐसी होगी तो थोड़ी कीमत कम हो सकती है। जैसी इन दिनों भाजपा में आए कांग्रेसियों की हो रही है। जो भी हो, तुम करो तो रासलीला, हम करें तो कैरेक्टर ढीला। समझ में नहीं आ रहा यदि लड्ड़ू बांटने और गंगा जल बांटने से ही चुनाव जीतना होता तो अभी तक हरिद्वार से बड़ी-बड़ी पाइप लाइनें आधे नेताओं के दरवाजे पर डल चुकी होतीं। अब क्या कर सकते हैं। कई मुहावरे यहां पर कांग्रेस-भाजपा के नेता सुना रहे हैं। भाजपाई कह रहे हैं जब भाजपा में ही जूतों में खीर बंट रही है तो फिर खाने दो। गधे गुलाब जामुन खा रहे हैं तो वहीं कांग्रेसियों का कहना है कि अभी सूत न कपास, फिर जुलाहो में काहे के लिए लट्ठमलट्ठा। हां, एक बात जरूर है, अभी चुनाव आए नहीं हैं, पर तुलसीदास की दोहावली में एक दोहा  जरूर है, जो सारी कहानी बयां करता है-
अब पावस ऋतु आई है, भई कोकिला मौन,
और अब तो दादुर बोलेंगे, फिर सुनेगा कौन।
(कोकिला मतलब कोयल, पावस ऋतु मतलब वर्षा और दादुर मतलब मेंढक)।
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